Wednesday, 11 January 2017

सामाजिक बदलाव के साधन रचनात्मक कार्यक्रम


- चन्दन कुमार, एस आर एफ (यूजीसी)
      पी -एच. डी., अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग  
                                                                                                                                             महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.  
रचनात्मक कार्यक्रम आदर्श-समाज निर्माण का साधन और साध्य है। इसका उद्देश्य समाज परिवर्तन के द्वारा एक नए समाज की रचना करना है, आंदोलन करना उद्देश्य नहीं है। इस संबंध में गांधी स्वयं कहते हैं कि, लड़ाई के द्वारा देश जीता जा सकता है, किन्तु उसे समृद्ध तो रचनात्मक कार्य के द्वारा ही किया जा सकता है।[1] इस तरह रचनात्मक कार्यक्रम समाज परिवर्तन के लिए सामूहिक प्रयत्न और लोक शिक्षण का काम करता है। गांधी की मान्यता के मुताबिक समाज परिवर्तन हिंसक जन-आंदोलन के द्वारा कभी-भी नहीं किया जा सकता है और न ही इसके जरिए टिकाऊ समाज परिवर्तन ही हो सकता है। रचनात्मक कार्यक्रम समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का बेहतर तरीका है। इस कार्यक्रम के द्वारा समाज को सिर्फ जगाने की जरूरत है। यदि समाज, रचनात्मक कार्यक्रम के उद्देश्य और फायदों के बारे में जानेगा तो अवश्य समाज में सम्पूर्ण क्रांति एवं  समाज परिवर्तन की लहर फैलने लगेगी। रचनात्मक कार्यक्रम में लगे व्यक्ति को प्रतिपक्षी से संघर्ष करने के लिए परस्पर सहयोग आदि से आत्म-शुद्धि के द्वारा आत्म-बल पैदा करने के लिए हमेशा तत्पर रहना पड़ता है। तथापि जिन दुर्गुणों के खिलाफ हम समाज में संघर्ष करेंगे उन दुर्गुणों को अपने में पालन करना न तो सत्य हो सकता और न ही अहिंसा, बल्कि वह पाखंड के घिनौने रूप में क्रियान्वित होगा।
        1941 में गांधीजी ने अपनी पुस्तक ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ की प्रस्तावना में लिखते है कि, रचनात्मक कार्यक्रम ही पूर्ण स्वराज्य या मुकम्मल आजादी को हासिल करने का सच्चा और अहिंसक रास्ता है। उसकी पूरी–पूरी सिद्धि ही संपूर्ण स्वतंत्रता है। गांधी जी ने कुल 18 प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम समाज परिवर्तन हेतु दिये और उनका मानना था कि, मेरी यह सूची पूर्ण होने का दावा नहीं करती यह तो महज मिसाल के तौर पर पेश की गई है।[2] समाज की जरूरत के हिसाब से बढ़ाये भी जा सकते हैं।
            गांधीजी का दक्षिण अफ्रीका में ही सत्याग्रह के दरमियान रचनात्मक कार्यक्रम की प्रारंभिक झलक देखने को मिलती है। जूलु विद्रोह, बोअर युद्ध और प्लेग जैसी बीमारी में घायलों की सेवा-सुश्रुषा एवं गाँवों की साफ-सफाई आदि। गांधीजी कहते हैं कि, दक्षिण अफ्रीका में समाज सेवा करना आसान नहीं था, लेकिन वहाँ जो कठिनाइयाँ सामने आती थीं, वे भारत की कठिनाइयों के मुक़ाबले में कुछ नहीं थीं। यहाँ समाज सेवक को अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता की जिन बाधाओं से लड़ना पड़ता है, उनका परिमाण बहुत ज्यादा है। रूढ़िवादी व्यक्ति बुराइयों से दूर रहकर सही रास्ते पर चलता है। लेकिन जब रूढ़िवादिता में अज्ञान, पूर्वाग्रह और अंधविश्वास आ मिलते हैं तब वह सर्वथा अवांछनीय हो जाती है।[3] भारत में भी गांधीजी ने आजादी की लड़ाई के दरम्यान रचनात्मक कार्यक्रम को साथ-साथ रखा था और उनका मानना था कि सच्ची आजादी तभी मिल पाएगी जब हम उस लायक बनेंगे। सन् 1920 में गांधीजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा रचनात्मक कार्यक्रम भारत के सामने रखा था। उस समय से इस कार्यक्रम की आवश्यकता और प्रभावोत्पादकता में उनकी श्रद्धा बढ़ती गई और इस बात पर वे अधिकाधिक ज़ोर देने लगे कि संग्राम के पहले नैतिक शक्ति को विकसित करने और अनुशासन को दृढ़ करने तथा संग्राम के बाद सुसंगठित होने के लिए और जीत के नशे या हार की उदासी से बचने के लिए रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रही के लिए आवश्यक है।[4] चूँकि सत्याग्रह में निषेधात्मक तत्वों के साथ-साथ भावात्मक मूल्य जुड़े होते हैं। इसीलिए रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रही के लिए भावात्मक पक्ष हैं। गांधी की ही तरह विनोबाजी असत्य को सत्य से, शस्त्र को वीणा से, चिल्लानेवाले को गायन और भजन से और विध्वंस के कार्य को रचनात्मक कार्य से जीतने की तकनीक देते हैं।             गांधीजी कहते हैं कि, लड़ाई के अंत में हममें निडरता आनी चाहिए और रचनात्मक कार्य के अंत में योजना-शक्ति और कार्य-शक्ति। यदि हममें योजना-शक्ति और कार्य-शक्ति न आये तो हम राज्य नहीं चला सकते। यदि हम अहिंसा से राज्य प्राप्त करें तो वह सेवा-वृत्ति से ही कायम रखा जा सकता है। किन्तु यदि हम सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से राज्य लेंगे तो वह केवल हिंसा से ही टिकेगा। उचित यह है कि हम अहिंसा की शक्ति को पुष्ट करें और सत्ता के बल त्यागें। जबतक हममें मिलकर रहने की शक्ति नहीं आती तबतक अहिंसा से स्वराज्य प्राप्त करना असंभव है। मैंने इसीलिए लोगों के सम्मुख त्रिविध कार्यक्रम रखा है।[5] रचनात्मक कार्यक्रम से सत्याग्रह आंदोलन पूर्ण, अहिंसक और सृजनशील बनता है। सत्याग्रह और रचनात्मक कार्यक्रम समाज परिवर्तन तथा सामाजिक नियंत्रण की पूरक पद्धति हैं। एक तरफ समाज में अंतर्निहित बुराई, शोषण, अन्याय और अत्याचार को सत्याग्रह द्वारा दूर किया जा सकता है वहीं दूसरी तरफ रचनात्मक कार्यक्रम द्वारा समतामूलक समाज संगठित कर सकते हैं। गांधीजी बराबर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि स्वराज प्राप्त करने के साधन के रूप में रचनात्मक काम करते रहना[6] अति आवश्यक है।           
जिस तरह समाज परिवर्तन का लक्ष्य समाज का सृजन या रचना है उसी तरह रचनात्मक कार्यक्रम का भी उद्देश्य नए समाज की रचना है और यही समाज परिवर्तन का मुख्य साधन है। रचनात्मक कार्यक्रम को दूसरे शब्दों में और अधिक उचित रीति से सत्य और अहिंसात्मक साधनों द्वारा पूर्ण स्वराज्य की यानि पूरी–पूरी आजादी की रचना कहा जा सकता है।[7] विद्यार्थियों की सभा में 18 सितंबर 1925 को भाषण में गांधीजी कहते हैं कि, समाज-सेवा के लिए सबसे पहली जरूरत चरित्र-बल कि है और समाज-सेवा करने के इच्छुक व्यक्ति में यदि चरित्र नहीं है तो वह समाज-सेवा करने योग नहीं है।[8] रचनात्मक कार्यक्रम सत्य एवं अहिंसा पर आधारित सामाजिक बदलाव है। इस संबंध में गांधीजी कहते हैं कि, यदि रचनात्मक कार्यक्रम में जीवंत श्रद्धा नहीं है तो समूहिक अहिंसा कि बात करना बेईमानी[9] होगी।
 समाज में रचनात्मक कार्यक्रम को कार्यरूप में लाना आपसी सहमती से होता है। इस काम के लिए अहिंसक पुरुषार्थ की आवश्यकता है। रचनात्मक कार्यक्रम का कार्य समाज में समझा–बुझाकर एवं  स्वंय उस दिशा में संघर्षरत एवं कार्यरत होकर करने और कराने की होती है। समाज-परिवर्तन की प्रक्रिया के बारे में विनोबा और धर्माधिकारी के विचारों को जिन तीन धारणाओं के आधार पर समझा जा सकता है- वे हैं ह्रदय-परिवर्तन, विचार-परिवर्तन और स्थिति-परिवर्तन। जो रचनात्मक कार्यक्रम के द्वारा संभव है। गांधी जी के लिए रचनात्मक कार्यक्रम का लक्ष्य ‘सर्वोदय समाज’ की स्थापना करना था, केवल अंग्रेजी सत्ता की समाप्ति नहीं।    
            गांधी जी ने हरिजन पत्रिका में लिखा है कि, मेरी राय में जिसे रचनात्मक कार्यक्रम में विश्वास नहीं है,  उसे भूख से पीड़ित करोड़ों देशवासियों के प्रति कोई ठोस भावना नहीं है और जिसमें यह भावना नहीं है, वह अहिंसक लड़ाई नहीं लड़ सकता है।[10] सच्चे सत्याग्रही की पहचान के लिए रचनात्मक कार्यक्रम वरदान स्वरूप है, उनमें अनुशासन, आत्मसंयम एवं सेवा का प्रशिक्षण ग्रहण करने या कराने की प्रयोगशाला हो जाती है। जब तक आधार सुदृढ़ नहीं होता है, उस पर अधिकार दिवास्वप्न जैसा ही प्रतीत होता है। रचनात्मक कार्यक्रम जन संपर्क का सबसे अधिक विश्वसनीय और उचित माध्यम है। गांधी की दृष्टि में, सेवा के बिना सच्ची राजनीतिक सेवा भी संभव नहीं है।[11] प्रत्यक्ष सेवा का जनता के ह्रदय पर जितना असर होता है उतना और किसी भी माध्यम का नहीं हो सकता है। यह कार्यकर्त्ताओं की सच्चाई का स्वतः सिद्ध सबूत भी है, क्योंकि यहाँ पाखंड, प्रवचन या नाटक नहीं बल्कि प्रत्यक्ष सेवा का क्रियान्वयन, मार्गदर्शन एवं कर्तव्यनिष्ठा का पालन है। गांधीजी के अनुसार, यज्ञमय जीवन कला कि पराकाष्ठा है, सच्चा रस उसी में है, क्योंकि उसमें से रस के नित्य नए झरने प्रकट होते हैं। मनुष्य उन्हें पीकर अघाता नहीं है, न वे झरने कभी सूखते है। यज्ञ यदि भाररूप जान पड़े तो यज्ञ नहीं है।[12] वे तो यहाँ तक कहते हैं कि, इस शरीर के अंदर रहने वाली आत्मा जो सेवा करने को उत्कंठित है यदि उसके लिए इस शरीर का उपयोग नहीं किया जा सकता तो मुझे उसके परिरक्षण में कोई दिलचस्पी नहीं रह सकती।[13] वे सेवक को अभिमान मुक्त रहना आवश्यक बताते हैं। सेवक को स्वप्न तक में यह खयाल नहीं आना चाहिए कि अगर वह नम्रता से, आदरपूर्वक या जी-जान से देहातियों कि सेवा करता है, तो किसी पर कोई उपकार करता है।[14] शुद्ध हृदय से किए गए सभी कार्यों का मूल्य एक जैसा ही होता है। हमें जो काम दिया गया है उससे प्राप्त होने वाला संतोष ही सच्ची भक्ति या साधना है। हमें जो सेवा करने का अवसर मिला है उसमें तन्मय हो जाना ही सच्ची समाधि है।[15] जो गरीबों कि सेवा करता है, वह अपने ऋण का हिस्सा अदा करता है।[16] नारायण मोरेश्वर खरे (10 फरवरी 1932) को पत्र में गांधीजी लिखते हैं कि, जो एक को सत्य लगता है, वह बहुत बार दूसरे को वैसा नहीं लगता, यह बात हम समय-समय पर देखते रहते हैं। किन्तु जो व्यक्ति इस तरह अपने माने हुए सत्य के अनुसार चलता है, उसे तलवार कि धार पर चलना पड़ता है।....सत्यशोधक इस चक्कर में नहीं पड़ेगा की अमुक कार्य से समाज का कल्याण होगा अथवा नहीं। वह तो कहेगा कि मैं कल्याण-अकल्याण की बात में नहीं पड़ता ; सत्य में ही सबका कल्याण है क्योंकि सत्य ही साक्षात, पूर्ण पुरूषोत्तम है।[17] जब मनुष्य में से अहंकार-वृत्ति और स्वार्थ का नाश हो जाता है तब उसके सारे कर्म स्वाभाविक और निर्दोष हो जाते हैं। वह बहुत से जंजालों से छूट जाता है।[18] गांधीजी ने यज्ञ का अर्थ माना है, अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरे के लिए, परोपकार के लिए किया हुआ श्रम अर्थात संक्षेप में `सेवा`। और जहाँ सेवा के निमित्त ही सेवा कि जाएगी वहाँ आसक्ति, राग-द्वेष नहीं होगा। ऐसी सेवा तू करता रह। ब्रह्मा ने जगत उपजाने के साथ-ही-साथ यज्ञ भी उपजाया; मानो हमारे कान में यह मंत्र फूंका कि पृथ्वी पर जाओ, एक-दूसरे कि सेवा करो और फूलो-फलो, जीवमात्र को देवता रूप जानो। इन देवों की सेवा करके तुम उन्हें प्रसन्न रखो, वे तुम्हें प्रसन्न रखेंगे।[19] समाज-सेवा का काम रोचक और तड़क-भड़कवाला काम नहीं है। उसमें परिश्रम, घोर परिश्रम करना पड़ता है। यह भी सच है कि उसमें आर्थिक दृष्टि से कोई आकर्षण नहीं होता। समाज-सेवा को मुश्किल से गुजारे लायक पैसों से ही संतोष करना पड़ता है और कभी तो वह[20] नसीब भी नहीं होता है।              
            रचनात्मक कार्य द्वारा जनता के बीच जाने का अच्छा तरीका है। इसके माध्यम से जनता के सुख–दु:ख के हम सहभागी बन सकते है। हिंसक आंदोलनकारी एक दूरवर्ती काल्पनिक राज–व्यवस्था या समाज व्यवस्था का चित्र भले ही दिखाते हो, लेकिन वह टिकाऊ समाज व्यवस्था नहीं हो सकता है। गांधीजी ने लिखा है कि, रचनात्मक कार्यक्रम का नक्शा अपने मन में खीचकर देखेंगें, तो उन्हें मेरी यह बात माननी होगी कि जिस कार्यक्रम को कामयाबी के साथ पूरा किया जाय तो उसका नतीजा आजादी या स्वतन्त्रता ही होगी, जिसकी हमें जरूरत है।[21] अहिंसक समाज रचना के लिए गांधीजी के द्वारा चलाये गए रचनात्मक कार्यक्रम में कौमी एकता, अस्पृश्यता–निवारण, शराबबंदी, खादी, दूसरे ग्रामोद्योग, गांवों की सफाई, नयी या बुनियादी तालिम, बड़ों की तालिम, स्त्रियाँ, आरोग्य के नियमों की शिक्षा, प्रांतीय भाषाएँ, राष्ट्रभाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदूर, आदिवासी, कोढ़ी और विध्यार्थी है। इन सभी रचनात्मक कार्यक्रम का अपना विशेष महत्व (स्थान) है। भाषण अनकापल्लीकी सार्वजनिक सभा में देते हुए गांधीजी कहते हैं कि, स्वराज्य के चार स्तंभों को हमेशा अपने में ध्यान रखिए। केवल खद्दर पहनिए, शराब तथा मादक वस्तुओं कि बुराई का उन्मूलन कीजिए, अस्पृश्यता निवारण कीजिए तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता और अन्तर्साम्प्रदायिक एकता के लिए काम करिए।[22] जिस कार्यक्रम से समाज में रचना हो वही रचनात्मक कार्य है। जो अनासक्ति पूर्वक कर्म का आचरण करते है वह ईश्वर का साक्षात्कार करता है।[23] गांधीजी इन रचनात्मक कार्यक्रमों के द्वारा भारत को स्वावलम्बी बनाना चाहते थे। रचनात्मक कार्यक्रम के क्रियान्वयन का मतलब स्वराज्य का ढ़ाचा खड़ा करना[24] था और उनको विश्वास भी था कि यदि सभी देशवासी रचनात्मक कार्यक्रम को पूरा करने में अपनी पूरी शक्ति लगा दें तो छ: महीने में नया भारत उपस्थित हो सकता है। देश स्वराज के लायक बनेगा तभी वह स्वराज का उपभोग कर सकता है। अगर सभी आर्थिक दृष्टि से समान नहीं होगें, तथा समाज से वंचित एवं पिछड़े वर्गों को हम नहीं अपनाएँगें तब तक राष्ट्र ऐसे ही सुलगता रहेगा चाहें वो संप्रदायिकता की आग हो चाहे गरीबी की, चाहे भ्रष्टाचार की और इस आग को बुझाना एवं एक नए राष्ट्र की रचना रचनात्मक कार्यों के द्वारा संभव है। रचनात्मक कार्यक्रम मानवाधिकारों एवं कर्तव्यों की चेतना का सूत्रपात करता है। इस तरह रचनात्मक कार्यक्रम ही शांत मूक और शुभ सामाजिक बदलाव की क्रांति हो सकती है।
                        
संपर्क: संस्कृति विद्यापीठ, अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र । मो.- 09763710526,                                        ई-मेल : chandankumarjrf@gmail.com




[1]  सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-37, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पृ.172  
[2] गांधी जी; रचनात्मक कार्यक्रम, नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, पुनर्मुद्रण, 2004, पृ.3
[3] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-28, पृ.207
[4] धवन, गोपीनाथ; सर्वोदय तत्त्व दर्शन, नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद, 1983, पृ. 210
[5] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-26, पृ.141 
[6] यंग इडिया, 2-7-1931
[7] गांधी जी; रचनात्मक कार्यक्रम, पृ.9
[8] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-28, पृ.206-7   
[9] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-75, पृ.151
[10] हरिजन, 12- 4- 1942
[11] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-28, पृ.207     
[12] वही, खंड-44, पृ.258     
[13] वही, खंड-44, पृ.156      
[14] हिन्दी नवजीवन, 24-10-1929
[15] वही, खंड-44, पृ.17      
[16] हिन्दी नवजीवन, 24-10-1929
[17] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-49, पृ.79      
[18] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-49, पृ.117     
[19] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-49, पृ.115      
[20] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-28, पृ.207     
[21] गांधी जी; रचनात्मक कार्यक्रम, पृ.10
[22] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-40, पृ.330      
[23] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-49, पृ.116      
[24] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-75, पृ.151

क्षेत्रीयतावाद एवं जन-आकांक्षा


                                                                           - चन्दन कुमार, एस आर एफ (यूजीसी)
पी -एच. डी., विकास एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
भारत विविधताओं वाला देश है, जिसमें क्षेत्रीयतावाद उस छोटे-से क्षेत्र से है जो आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि कारणों से अपने पृथक अस्तित्व के लिए जागृत है।[1] राष्ट्र की तुलना में क्षेत्रवाद किसी क्षेत्र विशेष, राज्य या प्रांत से लगाव उसके प्रति भक्ति या विशेष आकर्षण है। इस दृष्टि से क्षेत्रीयतावाद राष्ट्रीय एकता का विलोम है, जिसका उद्देश्य संकुचित क्षेत्रीय स्वार्थों की पूर्ति करना है। क्षेत्रीयता विभिन्नता की उत्पाद है, जिसमें सांस्कृतिक विभिन्नता, भाषायी लगाव, भौगोलिक, ऐतिहासिक, जातीयता, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रमुख कारण हैं। भारतीय संघीय व्यवस्था में क्षेत्रीयतावाद की विशिष्ट भूमिका रही है।
          स्वतन्त्रता के पश्चात क्षेत्रीयतावाद की चेतना भारतीय राजनीति में ज्यादा सक्रिय दिखलाई पड़ती है और इसी चेतना के अंतर्गत क्षेत्रवाद को लेकर अनेक संगठित आंदोलन, प्रचार और उपद्रव भारत के अनेक क्षेत्रों में हुआ और राज्यों की जनता में क्षेत्रीय अस्तित्व की प्रबल प्रादेशिक चेतना का उदय हुआ। जो राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के कुछ मामले में बाधक के साथ-साथ पुनर्निर्माण भी रहा है। जब क्षेत्रवाद उग्र या नकारात्मक स्वरूप ग्रहण करके अलगाववादी स्थिति की ओर अग्रसर हो जाता है तो राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता प्रभावित होती है। हम देखते हैं कि, जन-आकांक्षा में क्षेत्रीयतावाद की प्रवृत्ति के अनेक रूप रहे हैं, जिसमें भारतीय संघ से पृथक होने की मांग, अपने लिए पृथक राज्य की मांग, भाषायी विवाद, अंतरराज्यीय विवाद, क्षेत्रीय आर्थिक टकराव एवं क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव आदि प्रमुख हैं, परंतु इनमें से आज क्षेत्रीयतावाद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष पृथक राज्यों की मांग है जो आज भी जारी है एवं भारतीय राजनीति को प्रभावित कर देश की एकता एवं अखंडता को खतरा उत्पन्न[2] करता रहा है।      
          यह भी देखते हैं कि, संस्कृति और भाषा की दृष्टिकोण से राज्य का निर्माण करना बुरा नहीं हुआ है। लेकिन, केवल क्षेत्रीय भावना और संकुचित स्वार्थ पर आधारित राज्य का निर्माण करना घातक ही होगा। इससे राष्ट्रीय और भावनात्मक एकता को गहरा धक्का पहुंचेगा, देश राज्यों के आपसी विवादों का अखाड़ा बन जाएगा। केंद्र के लिए अनेक नए सिरदर्द पैदा हो जाएंगे तथा देश की राजनीति अधिक विघटनकारी मोड़ ले लेगी। यदि क्षेत्रीय भावनाएं और राजनीतिक आकांक्षाओं को संतुष्ट करने के लिए ही राज्यों का निर्माण करते चला जाय तो सैकड़ों राज्यों के निर्माण से भी इस भावना[3] को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है। हमारा देश इतना विशाल है कि इनमें अनेक क्षेत्र तो बहुत अधिक विकसित हैं जबकि कई क्षेत्र बहुत पिछड़े हुए हैं। सामाजिक विषमताओं के साथ आर्थिक विषमताएँ भी सामाजिक ढांचे को प्रभावित[4] करती रही हैं।
          भारतवासी अपने देश को एक राष्ट्र मानते हैं जबकि पश्चिमी विद्वान इसे एक राष्ट्र न कहकर बहुराष्ट्र संघ का नाम देते हैं एवं विभिन्न राज्यों को राष्ट्र मानते[5] हैं। जॉन स्ट्रेची का भी मानना है कि भारत एक ऐसा नाम है जो एक राष्ट्र का ही नहीं अपितु अनेक राष्ट्रों एवं देशों के संकलन का सूचक है।[6] प्रत्येक क्षेत्र की धर्म, संस्कृति आदि भिन्न हैं और इस तरह कोई भी दो प्रादेशिक क्षेत्र परस्पर समान नहीं है। यह विशिष्टता एवं भिन्नता राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग करती है। इसी से प्रांतवाद व संकुचित प्रादेशिकता की भावना का विकास होता है एवं अपने क्षेत्र की भाषा और संस्कृति को श्रेष्ठ मानने लगता है और दूसरे की भाषा एवं संस्कृति को हीन मानने लगता है। भारत की विविधताओं जैसे की भाषा, संस्कृति, धर्म तथा संजातीयता इत्यादि तथा क्षेत्रीयता को उचित प्रतिनिधित्व देना तथा इनके साथ समान व्यवहार किया जाना भारत के विकास तथा शांति व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक[7] है। राजस्थान में मारू प्रदेश, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड, पूर्वाञ्चल, भोजपुर तथा हरित प्रदेश, मध्य प्रदेश में विंध्य प्रदेश, बघेलखंड, रेवांचल, मध्य भारत, महाकोसल व मालवा, बिहार में मिथिला, गुजरात में सौराष्ट्र, महाराष्ट्र में कोंकण, विदर्भ, मराठवाड़ा, कर्नाटक में कुर्ग, कोडागु व सागरी प्रांत, पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड व कामतापुरी, उड़ीसा में कोशल राज्य, असम में कारबी अंगलोग तथा पुर्वांचल, नागालैंड में कुकीलैंड, मेघालय में गारोलैंड तथा मिजोरम में हमर राज्य। ये सभी मांगें सजातीय व भाषायी विविधता को एक क्षेत्रीय आधार प्रदान करवाने के लिए[8] की जाती रही है। इन्हीं के भीतर कई ऐसे प्रदेश हैं जिन्हें अपनी भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक परंपरा, धार्मिक विश्वास, भाषा और बोली पर गर्व है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के दो प्रमुख क्षेत्र हैं विदर्भ और मराठवाडा। इसी प्रकार बुंदेलखंड और गढ़वाल को, उत्तर प्रदेश के दो बड़े क्षेत्रों की श्रेणी[9] में रख सकते हैं।
          हम देखते हैं कि, आजादी के बाद से भारतीय सामाजिक और आर्थिक विकास की प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण असमानताएँ व्याप्त हुई हैं। नियोजित प्रणाली द्वारा विकास के विभिन्न कार्यक्रम क्षेत्रीय अर्थतन्त्र को जहां एक ओर विकासोन्मुखी करते हैं, वहीं तीव्र बढ़ती हुई जनसंख्या और उसका नगरों की ओर पलायन समस्त परिणामों को परिवर्तित कर देता है। यही कारण है कि भारतीय समाज व अर्थतन्त्र में क्षेत्रीय विषमताएँ सदैव दृष्टिगत रही हैं। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के प्रारम्भ में अपनाई गयी नीतियों के कारण ये विषमताएँ और अधिक प्रखर[10] रूप धारण कर चुकी है। इस तरह विकास की क्षेत्रीय असमानता मानवकृत है। भारत में भाषाई, धार्मिक, शैक्षिक, वर्ग, जाति आदि की असमानताओं के साथ-साथ विकास की क्षेत्रीय असमानताएँ एवं विषमताएँ विद्यमान हुई है। भारत के राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में यह स्पष्ट देखने को मिल रहा है। आर्थिक विकास के दृष्टिकोण से इनमें अनेक असमानताएँ हैं, जिसे दो भागों में बाँट कर देखा जा सकता है- अंतर्राज्यीय और अंत:राज्यीय। अन्तर्राज्यीय असमानताओं का तात्पर्य यह है कि विभिन्न राज्यों या प्रदेशों के बीच असमानताएँ एवं अंत:राज्यीय असमानताओं का अर्थ है, एक ही राज्यों या प्रदेशों के विभिन्न जिलों, खंडों या प्रादेशिक इकाइयों के बीच असमानताओं का होना। भारत में स्थित उड़ीसा, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, केरल आदि आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं, वहीं पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्य अधिक विकसित हुए।   
          क्षेत्रीयवाद को जन्म देने वाले अनेक कारण है स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद राज्यों का जब पुनर्गठन हुआ तो अंग्रेजों द्वारा लादी गई पुरानी सीमाओं को भुलाकर नहीं किया गया था, बल्कि उनको पुनर्गठन का आधार बनाया गया। इसी कारण एक राज्य में रहने वाले लोगों में एकता की भावना नहीं आ पाई। प्राय: भाषा और संस्कृति क्षेत्रीयवाद की भावनाओं को उत्पन्न करने में बहुत सहयोग देते हैं। तमिलनाडु के निवासी अपनी भाषा और संस्कृति को भारतीय संस्कृति से श्रेष्ठ मानते हैं। वे राम और रामायण की कड़ी आलोचना करते हैं। 1975 में उन्होंने तमिलनाडु में कई स्थानों पर राम-लक्ष्मण के पुतले जलाए। 1960 में इसी आधार पर उन्होंने भारत से अलग होने के लिए व्यापक आन्दोलन[11] किया था। क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में इतिहास का दोहरा सहयोग रहा है- सकारात्मक और नाकारात्मक। नार्मन डी. पामर का विचार है कि भारत की अधिकांश राजनीति क्षेत्रीयवाद और भाषावाद के बहुत-से प्रश्नों के चारों ओर घूमती है। क्षेत्रीयवाद की समस्याएँ स्पष्ट रूप से भाषा से संबन्धित हैं। भारत में सदैव ही अनेक भाषाएँ रही हैं और विभिन्न भाषाएँ बोलने वालों ने कई बार अलग राज्य के निर्माण के लिए व्यापक आंदोलन किए।
          क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में जाति की भी प्रधानता है। जिन क्षेत्रों में किसी एक जाति की प्रधानता रही है, वहीं क्षेत्रीयवाद का उग्र रूप देखने को मिला है। जहां किसी एक जाति की प्रधानता नहीं रही, वहां पर एक जाति ने दूसरी जाति को रोके रखा है और क्षेत्रीयता की भावना इतनी नहीं उभरी। यही कारण है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में क्षेत्रीयवाद का उग्र स्वरूप देखने को मिला, जबकि उत्तर प्रदेश में नहीं मिलता है।[12] क्षेत्रीयवाद को बढ़ाने में धर्म भी सहायक होता है। पंजाब में अकालियों की पंजाबी सूबा की मांग कुछ हद तक धर्म के प्रभाव का परिणाम था। यही हाल कश्मीर[13] का भी है। एक तरफ आर्थिक विकास में काफी असमानता रही है। कुछ प्रदेशों का आर्थिक विकास बड़े पैमाने पर किया गया और कुछ प्रदेशों का नगण्य ही रहा। जिन व्यक्तियों के हाथों सत्ता रही उसने अपने क्षेत्रों की ओर ज्यादा से ज्यादा विकास पर ध्यान दिया। 1966 से पूर्व पंजाब में सत्ता पंजाबियों के हाथों में रही, जिस कारण हिसार, गुड़गांव, महेन्द्रगढ़, जींद आदि क्षेत्रों का विकास न के बराबर ही रहा। आंध्र प्रदेश में सत्ता मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के नेताओं के पास रही, जिस कारण तेलंगाना पिछड़ा ही रहा। उत्तर प्रदेश में पूर्वी उत्तर प्रदेश पिछड़ा रह गया, राजस्थान में पूर्वी राजस्थान अविकसित रह गया और इसी प्रकार महाराष्ट्र में विदर्भ का विकास नहीं हो पाया। अत: पिछड़े क्षेत्रों में यह भावना उभरी कि यदि सत्ता उनके पास होती तो उनके क्षेत्र पिछड़े न रह जाते। इसीलिए इन क्षेत्रों के लोगों में क्षेत्रीयवाद कि भावना उभरी और उन्होंने अलग राज्य की मांग[14] रखी। कई राजनीतिक दल यह सोचकर क्षेत्र को अलग राज्य बनाए जाने की मांग करते हैं कि उससे सत्ता हाथ आएगी और अपनी महत्त्वाकांक्षाएँ पूर्ण होगी। क्षेत्रीयतावाद से राजनीतिक खेल भी खेला जाता रहा है, क्षेत्रीयतावाद को आधार बनाकर राज्य केंद्रीय सरकार से सौदेबाजी भी करता है। इस तरह के सौदेबाजी से लाभ भी होता है एवं हानि भी। सौदेबाजी न केवल आर्थिक विकास के लिए होता है, बल्कि महत्वपूर्ण समस्याओं को सुलझाने के लिए भी किए जाते हैं। अपने-अपने चुनावी क्षेत्र के विकास पर ज्यादा-से-ज्यादा ध्यान मंत्रिपरिषद के सदस्य गण देते हैं क्योंकि अपनी जीत पक्की कर सके। मतदान के पहले क्षेत्रीयता का सहारा लेकर राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चुनाव करते हैं एवं क्षेत्रवाद की भावना को भड़काकर मत वटोरते हैं। कुछ राजनीतिक दल क्षेत्रीयता का सहारा लेकर हिंसक गतिविधियों को उभार कर लोकप्रियता का साधन बना लेते हैं। मंत्रिमंडल गठन में भी क्षेत्रीयता की प्रवृत्ति दिखती है। प्राय: मुख्य क्षेत्र के प्रतिनिधियों को मौका मिलता है। अब तक शिकायत प्रधान मंत्री के पद को लेकर होता है कि दक्षिणी राज्यों से नहीं बना है।
          इस तरह हम देखते हैं कि, क्षेत्रीयवाद उस समय तक जटिल समस्या उत्पन्न नहीं करता जब हद में रहता है लेकिन जब यह भावना उग्र रूप ग्रहण कर लेता है तब यह राष्ट्रीय एकता के लिए भयानक होता है। सेलिग एस. हेरिसन ने इस खतरे के बारे में कहा है कि, ‘यदि क्षेत्रीयवाद की भावना या किसी विशेष क्षेत्र के लिए अधिकार या स्वायत्तता की मांग बढ़ती चली गई, तो इससे या तो देश अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बंट जाएगा या तानाशाही कायम हो जाएगी।’[15] रजनी कोठारी का मानना है कि सिर्फ भाषा को आधार बनाकर राज्यों का पुनर्गठन नहीं करना चाहिए इसके अतिरिक्त आकार, विकास की स्थिति, सामाजिक एकता, शासन की सुविधा तथा राजनीतिक व्यवहारिकता पर ध्यान देना चाहिए। यों तो राज्य की मांग विकेन्द्रीकरण का मार्ग है। फिर भी जनता एवं क्षेत्र की स्थिति को ध्यान में रखते हुए एवं राजनीति न करते हुए जनता की आकांक्षा को नकारना विकास की स्वतंत्र मानसिकता को लाभ के बदले हानि पहुंचाना है। इसलिए जन-आकांक्षा को भी नकारा नहीं जा सकता है।  

संपर्क :  विकास एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, पंचटीला वर्धा,                         महाराष्ट्र (442005), मो. नं. 9763710526, ई-मेल: chandankumarjrf@gmail.com


संदर्भ-सूची



[1] सेंगर, शैलेन्द्र; भारतीय राजनीति उभरते मुद्दे, पुष्पांजलि प्रकाशन, दिल्ली, 2006, पृ. 178
[2] जैन, राजेश; क्षेत्रीयतावाद और भारतीय राजनीति, भावना प्रकाशन, दिल्ली, 2004, पृ. 11
[3] सिंह, विरकेश्वर प्रसाद; भारतीय राजनीतिक व्यवस्था, ज्ञानदा प्रकाशन (पी. एंड डी.), नई दिल्ली, 2010, पृ. 300
[4] शर्मा, सुरेन्द्र कुमार; संविधान और सरकार, डिस्कवरी पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 2007, पृ. 123
[5] पाण्डेय, गणेश; भारतीय समाज, राधा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, 2008, पृ. 229
[6] वही;
[7] शर्मा, संजय; संघवाद और क्षेत्रीय आकांक्षाएँ, भारत में राजनीतिक प्रक्रियाएं,  सं., बी. एन. चौधरी एवं युवराज कुमार, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय दिल्ली विश्वविद्यालय, अप्रैल, 2013, पृ. 76 
[8] वही, पृ. 90  
[9] जैन, राजेश; उपरिवत, पृ. 18 
[10] वही, पृ. 18-19
[11] सेंगर, शैलेन्द्र; उपरिवत, पृ. 185
[12] वही;
[13] वही;
[14] वही, पृ. 186   
[15] सेंगर, शैलेन्द्र; उपरिवत, पृ. 188