Tuesday, 1 September 2015

गांधीजी का ब्रह्मचर्य दर्शन एवं उनके ब्रह्मचर्य प्रयोग पर उठे विवाद

गांधीजी का ब्रह्मचर्य दर्शन एवं उनके ब्रह्मचर्य प्रयोग पर उठे विवाद
- चन्दन कुमार, एस आर एफ (यूजीसी)
पी -एच. डी. ,अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
         
गांधीजी प्रयोग धर्मी थे एवं आश्रम उनका प्रयोग स्थल। उनके लिए सत्य ही ईश्वर था। सत्य की प्राप्ति के लिए उनका प्रयोग उनके अंतिम दिनों तक चलता रहा। गांधीजी का प्रयोग ऐसा प्रयोग था, जिसमें जितना उतरते गए उनके लिए उतना ही कम प्रतीत होता चला गया। इसलिए वे दुनिया को संदेश के तौर पर कहते है कि, ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’। गांधीजी द्वारा दिया गया ब्रह्मचर्य सिद्धान्त सत्य की प्राप्ति का साधन है। सत्य की प्राप्ति के लिए हमेशा प्रयोगरत रहे। वे कहते है कि, जब मैं सत्य को खोजता हूँ तो अहिंसा कहती है कि मेरे द्वारा खोजो और जब मैं अहिंसा को खोजता हूँ तो सत्य कहता है कि मेरे द्वारा खोजो। इस तरह गांधी सत्य और अहिंसा कि तुलना ऐसे चकती से करते है जहां यह पता लगाना मुश्किल है कि, कौन सा भाग सत्य है और कौन-सा भाग अहिंसा। सत्य और अहिंसा के बाद तीसरे व्रत में ब्रह्मचर्य को प्राथमिकता गांधीजी देते है। वे कभी दावा नहीं करते है कि, पूर्ण ब्रह्मचर्य की प्राप्ति हुई। वे अग्रसर रहे, अपने विचारों पर उतना नियंत्रण प्राप्त नहीं कर पाए जितना अहिंसा से संबंधित उनके अनुसंधान के लिए आवश्यक था। वे कहते है कि, मेरी अहिंसा को संसर्गज और संक्रामक बनाना है तो मुझे अपने विचारों पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण प्राप्त करना होगा।[i] अहिंसा पर पूरा-पूरा अमल करना ब्रह्मचर्य के बिना नामुमकिन है। अहिंसा यानि सब जगह फैला हुआ, सर्वव्यापी प्रेम। जहां पुरुष ने एक स्त्री को या स्त्री ने एक पुरुष को अपना प्रेम दे दिया, वहां उसके पास दूसरे के लिए रहा ही क्या? उसका मतलब यही हुआ कि ‘हम दो पहले, दूसरे सब बाद में’। पतिव्रता स्त्री पुरुष के लिए और पत्नीव्रती पुरुष स्त्री के लिए सब-कुछ कुरबान करने को तैयार रहता है, इससे साफ जाहीर होता है कि उसके द्वारा सर्वव्यापी प्रेम का पालन कभी नहीं हो सकता। वह सारी दुनिया को अपना कुटुंब नहीं ही बना सकेगा, क्योंकि उसका अपना माना हुआ एक कुटुंब मौजूद है या बन रहा है। वह कुटुंब जितना बढ़ता है उतना ही सर्वव्यापी प्रेम में, विश्वप्रेम में खलल पहुंचाता है।... इसलिए अहिंसा-व्रत का पालन करने वाला आदमी ब्याह नहीं कर सकता; तब फिर ब्याह से बाहर के विकारों का तो पुछना ही क्या?[ii] पूर्ण त्याग अर्थात पूर्ण ब्रह्मचर्य एक आदर्श स्थिति है। गांधीजी कहते है कि, यदि आपमें ब्रह्मचर्य हासिल कर सकने का साहस नहीं है तो विवाह अवश्य कीजिए, पर कम-से-कम आत्मनियंत्रण से तो रहिए।[iii] पूर्ण ब्रह्मचर्य अथवा विवाहित ब्रह्मचर्य उनके लिए है जो आध्यात्मिक अर्थात उच्चतर जीवन जीने के आकांक्षी हों।[iv] गांधी जी ने सत्य और अहिंसा व्रत के पालन के लिए ब्रह्मचर्य व्रत को साधन माना। इसके बिना सत्य की प्राप्ति असंभव है। 
          गांधी जी का ब्रह्मचर्य किताबों से लिया गया नहीं है। गांधीजी अपने और इस प्रयोग में सम्मिलित होने वाले अपने साथियों के लिए मार्गदर्शक नियम स्वयं बनाए। न सिर्फ यह कि उन्होंने पूर्वनिर्धारित नियमों को नहीं माना, बल्कि उन्होंने इस कथन को भी नकार दिया कि स्त्री सभी बुराइयों और प्रलोभनों की जड़ है। उनके अंदर जो भी अच्छाई है, उसका श्रेय वे अपनी मां को ही देते है। गांधीजी स्त्री को कभी वासना की तृप्ति का साधन नहीं मानते, बल्कि अपनी मां के समान ही पूज्य मानते है। वे कहते है कि, पुरुष ही प्रलोभन देता है, पुरुष ही आक्रामक है। स्त्री का स्पर्श पुरुष को भ्रष्ट नहीं करता, पुरुष प्राय: स्वयं ही इतना अपवित्र होता है कि स्त्री का स्पर्श करने योग्य नहीं रह जाता।[v] परूष को यह समझना जरूरी है।
          गांधीजी का मानना है कि, जिस दिन से मैंने ब्रह्मचर्य की शुरुआत की, हम स्वतंत्र होने लगे। मेरी पत्नी एक स्वतंत्र स्त्री बन गई, उसके स्वामी के रूप में मैं उस पर जो अधिकार चलाता था उससे वह मुक्त हो गई और मैं अपनी उस भूख की गुलामी से छुटकारा पा गया जिसकी तृप्ति का साधन वह थी। किसी अन्य स्त्री के प्रति मेरे मन में उस तरह का आकर्षण नहीं था जैसा कि अपनी पत्नी के प्रति था। मैं अपनी पत्नी के प्रति इतना नैष्ठिक था और अपनी मां के सामने किए गए प्रण से इतना बंधा था कि, मैं किसी अन्य स्त्री का दास नहीं बन सकता था। लेकिन मेरा ब्रह्मचर्य जिस रूप में मुझे मिला, उससे मैं स्त्री को मनुष्य की मां समझते हुए उसकी ओर अस्वस्त होकर खींचता चला गया। वह मेरे लिए इतनी पवित्र हो गई कि भोग की वस्तु कदापि नहीं बन सकती थी और इस प्रकार हर स्त्री तत्काल मेरे लिए मेरी बहिन अथवा बेटी बन गई।[vi] मां, बेटी और बहन को प्रत्येक स्त्री में देखना ब्रह्मचर्य के लिए दृढ़ता प्रदान करता है।  
          ब्रह्मचर्य का मूल अर्थ बताते हुए गांधीजी ने लिखा है कि, ब्रह्मचर्य यानि ब्रह्म की – सत्य की – खोज में चर्या यानि उसके मुताल्लिक आचार-बरताव।[vii] ब्रह्मचर्य मन, वचन, और तन से बरतने का होता है।[viii] भोग विलास से किसी ने सत्य को पाया हो आज तक एक भी मिसाल हमारे सामने नहीं है।[ix] जिस मनुष्य ने सत्य को पसंद किया है, जो उसी की उपासना (भक्ति) करता है, वह अगर उसे छोडकर किसी और चीज की आराधना करता है, तो व्यभिचारी साबित होता है। तब फिर विकार की आराधना तो हो ही कैसे सकती है? जिसकी सारी प्रवृत्ति, सारा काम सत्य के दर्शन के लिए है, वह बच्चे पैदा करने के या घर-संसार, कुटुंब-कबीला चलाने के काम में कैसे पड़ सकता है?[x] भोग-विलास के लिए वीर्य को गंवाना और शरीर को निचोड़ना यह कितनी बेवकूफी है? वीर्य का उपयोग दोनों की शरीर और मन की शक्ति को बढ़ाने के लिए है। विषय-भोग में उसका उपयोग करना उसका बहुत बड़ा दुरुपयोग है, इसलिए वह बहुत सी बीमारियों का मूल हो जाता है।[xi] जो शरीर को काबू में रखता है, लेकिन मन से विकार को पोसता रहता है, वह मूढ़ और मिथ्याचारी है।[xii] ईश्वर ने मनुष्य को यह बुद्धि दी है कि वह अपनी मां, अपनी बेटी और अपनी पत्नी के बीच भेद कर सके।[xiii] ब्रह्मचर्य का पूरी तरह पालन करने वाले स्त्री-पुरुष मनोवेगों से पूर्णतया मुक्त होते हैं। ऐसे व्यक्ति ईश्वर के सान्निध्य में निवास करते हैं, वे ईश-तुल्य होते हैं।[xiv] और मुक्ति को प्राप्त करते है।
          मन को विकारवाला रहने देना और शरीर को दबाने की कोशिश करना इसमें नुकसान ही है। जहां मन है वहां शरीर आखिर घसीटे बिना रहेगा ही नहीं। यहां एक भेद समझ लेना जरूरी है। मन को विकारबस होने देना एक बात है; मन अपने-आप, बगैर इच्छा के, जबरन विकारवाला हो जाए या हुआ करे यह दूसरी बात है। उस विकार में हम मददगार न हों, तो आखिर हमारी जीत है ही। गांधीजी क्षण-क्षण अनुभव करते हैं कि शरीर काबू में रहता है, लेकिन मन नहीं रहता। इसलिए शरीर को तुरंत बस में करके हम मन को बस में करने की हमेशा कोशिश करते रहें, तो हम (अपना) फर्ज अदा कर चुके। मन के बस में हम हुए कि शरीर और मन का झगड़ा शुरू हुआ, मिथ्याचार का आरंभ हुआ। जब तक मन के विकार को हम दबाते रहेंगे, तब तक दोनों साथ-साथ जाएंगे ऐसा कह सकते हैं।[xv] प्राय: जनन-इंद्रियों (लिंग, योनि) पर काबू पा लेना ही ब्रह्मचर्य माना जाता है। गांधीजी कहते है कि यह तंग और संकुचित व्याख्या है। तमाम विषयों पर रोक, काबू ही ब्रह्मचर्य है। जो दूसरी इंद्रियों को हवासों को जहां तहां भटकने देता है और एक ही इंद्रियों को रोकने की कोशिश करता है, वह निकम्मी कोशिश करता है।[xvi] कानों से विकार की बातें सुने, आंखों से विकार पैदा करने वाली चींजे देखे, जीभ से विकारों को तेज करने वाली चींजे स्वाद से खाए, हाथ से विकारों को तेज करने वाली वस्तुओं को छूए और फिर भी जनन-इंद्रियों को रोकने का इरादा कोई रखे, तो यह आग में हाथ डाल कर न जलने की कोशिश करने जैसा होगा। इसलिए जो जनन-इंद्रियों को रोकने की ठान ले, उसको तमाम इंद्रियों को विकारों से रोकने की ठान ही लेना चाहिए।[xvii]
          गांधीजी को ब्रह्मचर्य के बिना जीवन फीका और पशुवत प्रतीत होता है। पशु स्वभाव से ही आत्मसंयम नहीं जानता। मनुष्य इसीलिए मनुष्य है कि वह जितना चाहे उतना आत्मसंयम बरतने में समर्थ है।[xviii] आध्यात्मिक पूर्णता की प्राप्ति के लिए जीवन में मनसा, वाचा, कर्मणा पूर्ण आत्मनिग्रह का होना आवश्यक है। गांधीजी कहते है कि, जिस राष्ट्र में ऐसे लोग नहीं हैं, वह इस अभाव की वजह से दरिद्रतर राष्ट्र है।[xix] गांधीजी का कहना है कि, सब इंद्रियों को एक साथ बस में लाने की आदत डालें, तो जनन-इंद्रियों को बस में लाने की कोशिश तुरंत सफल होगी। इसमें मुख्य चीज स्वाद की इंद्रिय है।[xx] अस्वाद व्रत का ब्रह्मचर्य व्रत से नजदीकी संबंध है। ब्रह्मचर्य व्रत के लिए यह आवश्यक है कि भोजन पर उचित ध्यान दिया जाना चाहिए। जिसपर गांधीजी अग्रसर थे।   
          गांधीजी के ब्रह्मचर्य प्रयोगों पर विद्वान लेखकों-मनोविश्लेसकों द्वारा गांधी के ब्रह्मचर्य प्रयोगों पर आरोप लगाए जाते है एवं गांधी को कामुक व्यक्ति के तौर पर पेश करने की होती है। गांधीजी ने ब्रह्मचर्य का व्रत 1906 में लिया था।  व्रत का अर्थ गांधीजी ने अडिग निश्चय से लिया है, जिसे कोई उसे उस निश्चय से हटा नहीं सकता है।    
          मनु के साथ सहशयन एवं नग्न होने का हवाला दिया जाता है। 12 वर्ष की उम्र में ही मनु को जन्म देने वाली माता का निधन हो जाता है। कस्तूरबा ने मां के रूप में उसका पालन-पोषण किया और कस्तूरबा के निधन के बाद उसकी सारी ज़िम्मेदारी गांधीजी ने अपने हाथों में ले लिया। गांधी और मनु का रिश्ता एक ही साथ बाप-बेटी और मां-बेटी का था। जिसे मनु ने स्वीकार भी किया है और जैसा कहा जाता है कि, गांधीजी के मृत्यु के बाद मनु ने आजीवन शादी नहीं की।   
          पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार एवं लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड ने गांधीजी को समलैंगिक बताया है। गांधी की कालेनबाख से मुलाक़ात 1904 में हुई थी। टालस्टाय फार्म स्थापित करने के लिए कालेनबाख ने 1100 एकड़ जमीन उपलब्ध कराया था। अपनी 1909 में रचित पुस्तक हिन्द स्वराज का अंग्रेजी रूपान्तरण गांधीजी ने कालेनबाख के लिए ही किया था। जबकि कस्तूरबा उस समय जीवित एवं जवान थी, यदि गांधी कामुक ही होते तो समलैंगिक होने का प्रश्न ही नहीं उठता है।  
          गांधीजी के सार्वजनिक जीवन के ऐसे प्रसंग एवं तथ्य समाजहित एवं समाज दर्शन से जुड़े हुए है। जिसको लागू करना-करवाना एवं अमल करना एक बड़ी चुनौती पूंजीवादी दर्शन को रही है। इतिहास गवाह रहा है कि, जो दर्शन पूंजीवाद के विरुद्ध रहे है उसे तोड़ा-मरोड़ा जाए, जिससे से आने वाली पीढ़ी का उस दिशा कि ओर बढ़ने से पहले ही उनके मन-मस्तिष्क को विचलित कर दिया जाए। पूरे संदर्भ से काटकर मनमाने ढंग से रखना और उसके माध्यम से सनसनी पैदा करना बहुत आसान काम पूंजीवादी दर्शन का रहा है। यह नहीं भूला जा सकता है कि, गांधीजी ने भोगवाद की बुनियाद पर खड़ी पश्चिमी सभ्यता को हिन्द स्वराज नमक पुस्तक में ‘शैतानी सभ्यता’ कहा है। गांधीजी में पूंजीवादी साम्राज्यवाद को नकारने की हिम्मत दिखती है। पूंजीवाद के छिपित हिमायती गांधी की इस हिम्मत से भली-भांति वाकिफ एवं डरे हुए है। इसलिए उनके लिए यह जरूरी है कि वे गांधी के ऐसे पहलुओं और तथ्यों को मनमाने ढंग से सामने लायें जिससे नई पीढ़ी गांधीजी के संपूर्ण दर्शन से घृणा करने लगे। नई पीढ़ी को गांधी का परिचय इस तरह कराया जाय मानो गांधी काम-वासना में लिप्त दुनिया का सबसे कामुक व्यक्ति था। इतिहास इस बात का गवाह है कि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतों ने अपने खिलाफ उठ खड़ी होने वाली शक्तियों की जड़ों को काटने का कोई अवसर अपने हाथ से जाने नहीं दिया है। जिन विचारधाराओं से पूंजीवाद को चुनौती मिलती है चाहे अतीत, वर्तमान या भविष्य हो, वे उसको बदनाम करने, दागदार बनाने या साफ करने की हर संभव कोशिश में लगी रहती है।


संपर्क: अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, पंचटीला वर्धा,
महाराष्ट्र – 442005, मो.- 9763710526, ई-मेल: chandankumarjrf@gmail.com

संदर्भ-सूची




[i] हरिजन; 23-7-1938
[ii] गांधीजी; मंगल-प्रभात, नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद, ग्यारहवाँ, पुनर्मुद्रण, अक्तूबर, 2000, पृ. 16
[iii] हरिजन; 7-9-1935  
[iv] हरिजन; 5-6-1937  
[v] प्रभु, आर. के. एवं राव, यू. आर.; महात्मा गांधी के विचार, संकलन एवं संपादन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, आठवीं आवृत्ती, 2011, पृ. 266
[vi] हरिजन; 4-11-1939
[vii] गांधीजी; मंगल-प्रभात, पूर्वोक्त, पृ. 20
[viii] वही, पृ. 18
[ix] वही, पृ. 15 
[x] वही, पृ. 15 
[xi] वही, पृ. 17
[xii] वही, पृ. 18  
[xiii] प्रभु, आर. के. एवं राव, यू. आर.; पूर्वोक्त, पृ. 261
[xiv] यंग इंडिया; 5-6-1924
[xv] गांधीजी; मंगल-प्रभात, पूर्वोक्त, पृ. 18
[xvi] वही, पृ. 19
[xvii] वही, पृ. 19
[xviii] प्रभु, आर. के. एवं राव, यू. आर.; पूर्वोक्त, पृ. 261
[xix] यंग इंडिया; 13-10-1920
[xx] गांधीजी; मंगल-प्रभात, पूर्वोक्त, पृ. 19 

Saturday, 29 August 2015

अरस्तू एक अध्ययन

अरस्तू एक अध्ययन
       - चन्दन कुमार, एस आर एफ (यूजीसी)
पी -एच. डी. ,अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
अरस्तू को राजनीति शास्त्र का जनक से जानते है, लेकिन अरस्तू दास प्रथा के उत्प्रेरक है। अरस्तू प्लेटो के शिष्य थे, 20 वर्षों तक शिक्षा पायी थी। अरस्तू का जन्म मेसीडोनिया सागर के किनारे स्थित स्टेगिरा नामक ग्रीक उपनिवेश में 384 ईस्वी पूर्व में हुआ था। अरस्तू की महानता हमें उनके जीवन में नहीं देखने को मिलती है, उनकी लेखन कृतियों में देखने को मिलती है। अरस्तू का मानना है कि, जो समाज में नहीं रहता वह देवता है अथवा दानव।
अरस्तू ने राज्य की उत्पत्ति के तीन चरण बताए हैं। पहला, परिवार एवं राज्य की उत्पत्ति, जिसमें उनका मानना है कि, राज्य के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया में परिवार पहली इकाई है। दूसरा, गाँव एवं राज्य की उत्पत्ति, जिसमें उनका मानना है कि, राज्य की उत्पत्ति में गाँव दूसरा स्तर है। तीसरा, राज्य, जिसमें उनका मानना है कि, विकास की इस प्रक्रिया में तीसरा चरण राज्य का होता है। जब कई गाँव इकट्ठे होते हैं, तब राज्य का निर्माण होता है। राज्य के स्वरूप के बारे में अरस्तू का मानना है कि, राज्य एक स्वाभाविक संस्था है, राज्य का स्थान परिवार से पहले है, राज्य एक सर्वोच्च व आत्मनिर्भर समुदाय है, राज्य का स्वरूप जैविक है। राज्य के उद्देश्य के बारे में अरस्तू का मानना है कि, राज्य का अस्तित्व केवल जीवन के लिए नहीं, वरन अच्छे जीवन के लिए है। कई विद्वानों ने अरस्तू के राज्य विषयक मूल्यांकन किया है, जिसमें मानना है कि, परिवार को मानव संगठन की पहली इकाए मानना त्रुटिपूर्ण है। परिवार का उद्भव बाद में हुआ जब लोगों में सार्वजनिक नैतिकता की भावना पैदा हुई और उन्होंने उस प्रारंभिक जीवन के ढंग को त्याग दिया, जिसमें स्त्री व पुरुष पशुओं की तरह परस्पर मिलते थे। आकस्मिक व अस्थायी संसर्ग करके यह जाने बिना अलग हो जाते थे और बाद में इसका कोई पता नहीं रहता था कि उससे संसर्ग से होने वाली संतान के माता-पिता कौन थे। राज्य को मानव शरीर ही मान लेना अनुचित है। राज्य की वेदी पर व्यक्ति का बलिदान करना अरस्तू की भूल है। राज्य के उद्देश्य व कार्य संबंधी विचार अस्पष्ट हैं।
दासता संबंधी अरस्तू के विचार अमानुषिक एवं प्रतिक्रियावादी हैं। अरस्तू मानते है कि, प्रकृति द्वारा कोई भी बेमतलब काम नहीं किया जाता है। प्रकृति लोगों को शासक और शासित की श्रेणी में बांटती है। ये क्षमता सबमें नहीं बल्कि कुछ ही लोगों में पाई जाती हैं। इनके बीच की यह असमानता न्यायपूर्ण है। अरस्तू का यह मानना है कि, दासों और सेवकों का होना उसी प्रकार स्वभाविक व आवश्यक है जिसप्रकार संतान उत्पादन के लिए स्त्री का होना। दास का यंत्र से तुलना अरस्तू करते है। दास का गुण सिर्फ आज्ञा पालन का होना चाहिए। दासता का औचित्य इसलिए मानते है कि प्रकृति में जन्मजात असमानता है। यह प्राकृतिक वास्तविकता है, स्वामी वर्ग की आवश्यकता के लिए दास वर्ग का होना जरूरी है।
अरस्तू के शिक्षा विचार में शिक्षा का अर्थ नागरिकों को संविधान के अनुसार जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देने से है। अरस्तू स्त्रियों की शिक्षा की बात करते है, लेकिन पुरुषों जैसी शिक्षा देने की बात नहीं करते है, क्योंकि दोनों के कार्य क्षेत्र अलग-अलग है। स्त्रियों द्वारा राजनीति में भाग लेने का समर्थन करते है। शिक्षा को तीन क्रम में बांटते हुए पहला क्रम में 1 से 6 वर्ष के बच्चे को रखा है जिसमें भोजन व्यवस्था तथा शारीरिक विकास की बात करते है। द्वितीय क्रम में 7 से 14 वर्ष के बच्चों को रखा है, जिसमें बच्चे लिखना-पढ़ना, चित्रकला, संगीत जैसे विषय सीखें। तृतीय क्रम में 14 से 21 वर्ष के बच्चों को रखा है, जिसमें बच्चों का चारित्रिक और मानसिक विकास हो।
शासनों का वर्गिकरण अरस्तू ने इस प्रकार किया है। जब शासन एक व्यक्ति, कुछ व्यक्तियों अथवा बहुसंख्यक व्यक्तियों द्वारा सामान्य हित साधना की दृष्टि से किया जाता है, तो वह शासन का शुद्ध रूप होता है, पर जब शासन चाहे वह व्यक्ति का हो, या कुछ व्यक्तियों का हो अथवा बहुसंख्यक व्यक्तियों का हो, सार्वजनिक हित की साधना की दृष्टि से नहीं किया जाता है, तो उसका रूप विकृत शासन का होता है। राज्य व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के तीन सिद्धान्त दिए है। पहला, जब एक व्यक्ति के हाथ में सत्ता होती है उसे राजतंत्र कहा है जो राज्य का विशुद्ध रूप है। जब यह विकृत हो जाता है तब अत्याचारी शासन में तब्दील हो जाता। दूसरा, कुछ व्यक्तियों द्वारा जब सत्ता धारण किया जाता है तो राज्य का विशुद्ध रूप कुलीन तंत्र कहलाता है। जब यह विकृत हो जाता है तब यह वर्ग तंत्र या गुट तंत्र का रूप ग्रहण कर लेता है। तीसरा, जब समस्त या अधिकांश व्यक्ति के हाथ में सत्ता आती है, तो राज्य का शुद्ध रूप वैधानिक राजतंत्र का होता है, लेकिन जब यह विकृत हो जाता है तो वह भिड़तन्त्र में तब्दील हो जाता है। इस तरह अरस्तू का मानना है कि शासन का कोई भी रूप स्थायी नहीं है परिवर्तन का स्वरूप चक्रिय होता है। शासन के तीनों रूपों में से अरस्तू ने राजतंत्र को शासन का आदर्श रूप माना है। जो व्यक्ति सर्वगुण संपन्न हो और जो राज्य की सब प्रजा के विविध रूपों से ज्ञात हो ऐसे व्यक्ति को सच्चे रूप से मनुष्यों में ईश्वर माना जा सकता है। निर्धनता को क्रांति एवं अपराध की जननी मानते है। निर्धनों की संख्या अधिक होने पर राज्य का अंत शीघ्र हो जाता है।
संपत्ति संबंधी विचार में अरस्तू का मानना है कि, संपत्ति व धन को घर एवं राज्य के लिए उपयोगी है। संपत्ति गृहस्थी का भाग होता है इसलिए संपत्ति गृहस्थों के लिए अर्थशास्त्र है। अच्छा जीवन जीने के लिए संपत्ति का होना आवश्यक है। अरस्तू संपत्ति कि अत्यधिक असमानता को उचित नहीं मानते है, इसे वर्ग-विद्वेष फैलाने वाला भी मानते है।

इस तरह अरस्तू के विचार अपने है जो समाज को समझते हुए उन्होंने दिए हैं। 

संपर्क: संस्कृति विद्यापीठ, अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र. (442005) मो.- 09763710526;ईमेल:chandankumarjrf@gmail.com

Thursday, 6 August 2015

स्वदेशी और गांधी


- चन्दन कुमार, एस आर एफ(यूजीसी)
पी -एच. डी. ,अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
मो.-09763710526 ; ई मेल:chandankumarjrf@gmail.com 
         
गांधीजी स्वदेशी को व्रत के रूप में स्वीकार करते है। व्रत का अर्थ होता है अडिग निश्चय। अड़चनों को पार करने के लिए ही व्रत की आवश्यकता होती है। अड़चन बरदाश्त करते हुए भी जो टूटता नहीं, वही अडिग निश्चय माना जाता है। ऐसे निश्चय के बगैर मनुष्य लगातार ऊपर चढ़ ही नहीं सकता[1] है। गांधीजी भारतीय अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलाव से वाकिफ थे। लघु एवं कुटीर उद्योगों का ह्रास बड़े पैमाने पर हो रहा था। सभी व्यक्तियों को रोजगार कैसे मिले इसके लिए स्वदेशी को व्रत के रूप में अपनाने कि वकालत गांधीजी की रही। भारत अपने ताकत के बल पर उन्नत कैसे बना रहे इसकी चिंता को दूर करने के लिए स्वदेशी जैसे विचार पर बल देना गांधीजी के लिए आवश्यक प्रतीत हुआ। गांधीजी सब का उदय और सबों के द्वारा उदय की कामना स्वदेशी विचार से संभव बनाने के लिए स्वदेशी को व्रत रूप में अपनाना चाहते थे। गांधीजी का स्वदेशी विचार राष्ट्र और गांव को उन्नत बनाने का रहा है। स्वदेशी का पालन करते हुए मौत हो जाए तो भी अच्छा है, पर परदेशी तो खतरनाक ही है। स्वधर्म यानि स्वदेशी।[2] स्वदेश में निर्मित वस्तु का उपयोग यानि पड़ोसी से प्रेम का दर्शन है। स्वदेशी-व्रत का पालन करने वाला हमेशा अपने आस-पास निरीक्षण करता है और जहां-जहां पड़ोसियों की सेवा की जा सकती है। यानी जहां उनके हाथ का तैयार किया हुआ जरूरत का माल होगा वहाँ दूसरा माल छोड़कर उसे लेगा। फिर भले ही स्वदेशी चीज पहले-पहल महंगी और घटिया दर्जे की हो। व्रतधारी उसे सुधारने की कोशिश करेगा; स्वदेशी चीज खराब है इसलिए कायर बनकर परदेशी का इस्तेमाल करने नहीं लग जाएगा।[3] स्वदेश भावना वह भावना है जो हमें दूर-दराज के इलाकों को छोड़कर अपने समीपस्थ क्षेत्रों का उपयोग करने और उनकी सेवा करने तक सीमित करती है।[4] गांधीजी आम आदमी की घोर निर्धनता का सबसे बड़ा कारण आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र में स्वदेशी का त्याग मानते है। यदि एक भी चीज भारत के बाहर से न खरीदी जाती तो इस देश में घी-दूध की नदियां बह रही होती[5] अर्थात गांधीजी देश का पैसा देश में ही स्वदेश विचार के द्वारा रखने की बात करते है।
          स्वदेशी व्रत जानने वालों को कुएं में डूब मरने की बात गांधीजी नहीं करते है। जो चीज स्वदेश में नहीं बनती या बड़ी तकलीफ से बन सकती हो, उसे परदेश के द्वेष (डाह) के कारण वह अपने देश में बनाने लग जाए, तो उसको गांधीजी स्वदेशी-धर्म नहीं मानते है। स्वदेशी धर्म का पालन करने वाला परदेशी का द्वेष कभी नहीं करता है। इसलिए पूर्ण स्वदेशी में किसी का द्वेष नहीं है। वह संकुचित धर्म नहीं है। वह प्रेम से- अहिंसा से- निकाला हुआ सुंदर धर्म है।[6] गांधीजी कहते है कि मैं भारत के जरूरतमन्द करोड़ों निर्धनों द्वारा काते और बुने गए कपड़े को खरीदने से इंकार करना और विदेशी कपड़े को खरीदना पाप समझता हूँ, भले ही वह भारत के हाथ से कते कपड़े की तुलना में कितने ही बढ़िया किस्म का हो।[7] स्वदेशी के सिद्धान्त का पालन करने पर यह कर्त्तव्य हो जाता है कि ऐसे पड़ोसियों की खोज होनी चाहिए जो हमारी आवश्यकता की वस्तुएं हमें दे सकें और यदि वे किन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करने में असमर्थ हों तो उन्हें उपेक्षित प्रशिक्षण दें।...यदि ऐसा होगा तो भारत का प्रत्येक गांव लगभग स्वावलंबी और स्वत:पूर्ण हो जाएगा और वह दूसरे गांवों के साथ उन्हीं आवश्यक वस्तुओं की अदला-बदली करेगा जिनका उत्पादन संभव नहीं है।[8] शिक्षा के मामले में भी स्वदेशी की भावना के घातक त्याग से देश को बहुत अधिक हानि पहुंची है। हमारे शिक्षित वर्ग की शिक्षा विदेशी भाषा के माध्यम से हुई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि वे आम जनता के साथ तादात्म्य नहीं कर पाए। वे आम-जनता का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं, लेकिन उसमें सफल नहीं हो पाते। आम लोग उसे उसी अपरिचय की दृष्टि से देखते हैं जिस दृष्टि से वे अंग्रेज़ अधिकारियों को देखते थे। दिल से जुड़ाव तो स्वदेश में स्वदेशी भाषा से ली गई शिक्षा में है।
          गांधीजी का मानना है कि स्वदेशी को न समझने से गड़बड़ी पैदा होती है। कुटुंब पर मोह रखकर उससे झूठा लाड़-प्यार करना, उसके खातिर धन चुराना, दूसरी चालें चलना, यह स्वदेशी नहीं है। स्वदेशी का पालन करते हुए कुटुंब की क़ुरबानी भी करनी पड़ती है। लेकिन ऐसा करना पड़े तो उसमें भी कुटुंब की सेवा होनी चाहिए। उदाहरण स्वरूप गांधीजी समझाते हुए कहते है कि मान लीजिए कि मेरे गांव में महामारी फैली है। उस बीमारी में फंसे हुए लोगों की सेवा में मैं अपने को, अपनी पत्नी को, पुत्रों को और पौत्रियों को अगर लगाऊँ और उस बीमारी में फँसकर सब मौत की शरण चले जाए, तो मैंने कुटुंब का नाश नहीं किया, मैंने उसकी सेवा ही की है। स्वदेशी में कोई स्वार्थ नहीं है; अगर है तो वह शुद्ध स्वार्थ है। शुद्ध स्वार्थ यानि परमार्थ; शुद्ध स्वदेशी यानि परमार्थ की आखिरी हद।[9] जो व्यक्ति ‘दूरस्थ दृश्य’ के आकर्षणों में फँसकर दुनिया के दूसरे कोने तक सेवा करने के लिए भागता है, वह न केवल अपनी आकांक्षा की पूर्ति में असफल होता है बल्कि अपने पड़ोसियों के प्रति अपने कर्तव्य से भी विमुख होता है।[10] गांधीजी का मानना है कि व्यक्ति एक ही साथ अपने पड़ौसियों और मानवता की सेवा कर सकता है; शर्त यही है कि पड़ौसियों की सेवा के पीछे स्वार्थ या अनन्यता का भाव न हो, अर्थात उसमें अन्य व्यक्तियों का शोषण निहित न हो। तब पड़ौसी भी उस भावना को समझ सकेंगे जिस भावना से आप उनकी सेवा करना चाहते हैं। वे यह भी जान जाएंगे कि बदले में उन्हें भी अपने पड़ौसियों की सेवा करनी है। इस प्रकार इस सेवाभाव की गुणोत्तर वृद्धि होती जाएगी और यह समूची दुनिया को समाविष्ट कर लेगी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि स्वदेशी वह भावना है जो आपको अन्य लोगों की चिंता किए बिना अपने निकटस्थ पड़ौसी की सेवा के लिए प्रेरित करती है। शर्त यह यह कि, पड़ौसी भी, बदले में, अपने पड़ौसी की सेवा करे। इस अर्थ में, स्वदेशी में अनन्यता का कोई भाव नहीं है। इसमें केवल इस वैज्ञानिक मर्यादा को स्वीकार किया गया है कि मनुष्य की सेवा करने की सामर्थ्य की भी एक सीमा है।[11] स्वदेशी के लिए जीवन की इस योजना के तहत गांधीजी दूसरे सभी देशों को छोड़कर केवल भारत की सेवा कर किसी अन्य देश कोई क्षति नहीं पहुंचाना चाहते है। गांधीजी का राष्ट्रप्रेम व्यावर्तक भी है और समावेशी भी। व्यावर्तक इस अर्थ में है कि गांधीजी पूरी विनम्रता के साथ अपना ध्यान अपनी जन्मभूमि तक सीमित रखते है और समावेशी इस अर्थ में है कि सेवा का स्वरूप स्पर्धात्मक या विरोधात्मक बिलकुल नहीं है। विदेश में निर्मित हर चीज को त्याज्य समझना स्वदेशी के अर्थ में गांधीजी की मंशा नहीं है। स्वदेशी की मोटी परिभाषा यह है कि देशी उद्योगों को संरक्षण प्रदान करने के लिए विदेशी वस्तुओं का त्याग करके देशी वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए। यह बात उन उद्योगों पर खास तौर से लागू होती है जिनके नष्ट होने पर भारत कंगाल हो जाएगा। स्वदेशी का अभिप्राय घृणा फैलाने का अभियान नहीं है। यह निस्वार्थ सेवा का सिद्धान्त है जिसकी जड़ में विशुद्ध अहिंसा अर्थात प्रेम है।[12] जो सबों को आपस में एकता के सूत्र में पिरोये रखता है।
          इस तरह गांधीजी का स्वदेशी विचार पड़ोसी से प्रेम एवं आत्म निर्भर बनाने के साथ-ही-साथ देश को उन्नत बनाने का रहा है। यदि सभी पड़ोसी एक दूसरे की सेवा स्वदेशी विचार से करने लगे तो भारत को आत्मनिर्भर देश बनने में समय नहीं लगेगा।  
  




[1] गांधीजी; मंगल-प्रभात, नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद, ग्यारहवाँ, पुनर्मुद्रण, 1958, पृ. 59
[2] वही; पृ. 55 
[3] वही; पृ. 57-58  
[4] प्रभु, आर. के. एवं राव, यू. आर.; महात्मा गांधी के विचार, संकलन एवं संपादन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, आठवीं आवृत्ती, 2011, पृ. 394-395
[5] वही; पृ. 396
[6] गांधीजी; मंगल-प्रभात, पूर्वोक्त, पृ. 58
[7] यंग इंडिया; 12-3-1925
[8] प्रभु, आर. के. एवं राव, यू. आर.; पूर्वोक्त, पृ. 396
[9] गांधीजी; मंगल-प्रभात, पूर्वोक्त, 1958, पृ. 56 
[10] प्रभु, आर. के. एवं राव, यू. आर.; पूर्वोक्त, पृ. 399
[11] हरिजन; 23-7-1947
[12] प्रभु, आर. के. एवं राव, यू. आर.; पूर्वोक्त, पृ. 400