Wednesday, 11 January 2017

गांव एवं गांधी


                               - चन्दन कुमार, एस आर एफ (यूजीसी)
पी -एच. डी., अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
भारत कृषि प्रधान गांवों का देश है और गांव का इतिहास मानव सभ्यता के विकास का इतिहास रहा है। गांव परिवारों या व्यक्तियों का समूह मात्र नहीं है। विभिन्न ऐतिहासिक काल-खण्डों में गांव के भिन्न-भिन्न रूप रहे हैं। गांव एक प्रशासनिक, उत्पादक एवं राजस्व इकाई के रूप में व्यवहृत हुए हैं। वेदों में परिवारों के समूह जो एक स्थान पर एक साथ रहते थे को, गांव कहा गया है।[1] 14वीं शताब्दी के आस-पास गांव के लिए ‘मौजा’ शब्द का भी प्रयोग मिलता है। वित्तीय शब्दावली में इसका अर्थ ‘निचली वित्तीय इकाई से है।’ जिसका मुखिया एक मण्डल (गांव प्रधान) होता था।[2] प्रशासनिक दृष्टि से भी, ग्राम वह आबाद क्षेत्र है जिसकी सीमा निश्चित हो और जिस ग्राम के अलग अभिलेख तैयार किए गए हों।[3] गुप्त वंश के शासनकाल में प्रशासन की छोटी इकाई ग्राम थी। वैदिक काल से लेकर हमारे सभी धार्मिक ग्रंथों और प्राधिकृत साहित्यिक रचनाओं में गांव की समृद्धि के बारे में चर्चा मिलती है। भारतीय गांव की आर्थिक समृद्धि के कारण ही भारत को ‘सोने की चिडि़याँ’ कहा जाता था। भारतीय गांवों के आर्थिक समृद्धि के मूल में खेती, पशुपालन व ग्रामीण कारीगरी का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। वेद, रामायण, बुद्ध, कौटिल्य का अर्थशास्त्र आदि सभी ग्रंथों में किसानों और कारीगरों की सम्मानित स्थिति का उल्लेख देखने को मिलता है। 17वीं, 18वीं शताब्दी के अंग्रेजी दस्तावेजों में भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में जानकारी मिलती है। प्राचीन काल में भारत में लोहे और इस्पात के उत्पादन, उसकी श्रेष्ठता और विश्‍व प्रसिद्धि सर्वविदित थी। 1800 के आसपास भी देश में यह उद्योग ग्रामीण स्तर पर बहुत बड़े क्षेत्र में था और उत्पादन की तकनीक के मामले में बहुत उन्नत अवस्था में था। भारतीय कृषि की प्रौद्योगिकी, खेती के औजार उन्नत अवस्था में थे।                                                                         
            लेकिन, अंग्रेजों के दासत्व में गुलाम देश का गुलाम गांव बन गया। अंग्रेज यहां आए और उन्होंने यहां की ग्राम व्यवस्था को समाप्त कर दिया। परिणाम यह हुआ कि देश तो पराधीन बना ही, साथ ही साथ गांव भी पराधीन बन गया। पराधीन गांवों का पराधीन देश। इस प्रकार हिंदुस्तान कि ग्राम व्यवस्था को तोड़ने का काम अंग्रेजों ने किया और उसमें वे सफल भी रहे। अंग्रेजों के पूर्व अनेकों हमले हुए थे, लेकिन ग्राम व्यवस्था नहीं टूटी थी। आज भी अंग्रेजों से आजादी मिलने के 70 साल बाद भी गांवों की स्थिति में सुधार नहीं हो पाया है। कारण मानसिकता अंग्रेजों वाली ही रह गई है। गांधीजी चाहते थे, अंग्रेजियत चली जाय, भले ही अंग्रेज रह जाए। परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात अंग्रेज तो चले गए लेकिन हमलोगों ने अंग्रेजियत को गले लगा लिया है।
            गांधी ऐसे भारत की कल्पना नहीं करते थे जहां निर्धनता हो, जिसमें करोड़ों अज्ञानी लोगों का वास हो। गांधी की कल्पना में भारत अपनी प्रकृति के अनुरूप निरंतर प्रगति करने वाला देश बने। जिसमें कोई निरक्षर नहीं हो, कोई बेरोजगार नहीं हो, प्रत्येक के पास भरपूर काम हो एवं पौष्टिक भोजन मिले, हवादार मकान हो, तन ढकने के लिए प्रयाप्त कपड़े हो, सभी ग्रामवासियों को स्वास्थ्य-रक्षा तथा स्वच्छता के नियमों का ज्ञान हो। गांव में एक मंच, स्कूल और सार्वजनिक सभागार हो। इस तरह गांधी प्रत्येक गांव को अपने पैरों पर खड़ा होने की बात करते है एवं अपने गांव कि प्रत्येक जरूरत की चीजें गांव में ही पैदा करने को कहते हैं। विशेष परिस्थिति में ही आवश्यक चीजें बाहर से मंगाई जाये। हर गांव अपने पैसे से पाठशाला, सभा-भवन या धर्मशालाएं बनाए। संभव हो तो कारीगर उसी गांव के हों। गांव के प्रत्येक व्यक्ति को स्वच्छ अनाज, स्वच्छ पानी और स्वच्छ मकान मिले इसका ध्यान रखना जरूरी है। प्रत्येक प्रवृति सहकारी ढंग से चलाने चाहिए गांव के लोग सार्वजनिक काम को हाथ में लें और गांव ही कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका का काम करे।[4] इस तरह गांधीजी स्वतंत्र भारत को आत्मनिर्भर गांवों का महासंघ बनाना चाहते थे। गांधीजी ग्राम-सभ्यता को कभी-भी नष्ट नहीं होने देना चाहते थे। उनका कहना था कि, हम ऊँची ग्राम सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। हमारे देश की विशालता, आबादी की विशालता और हमारी भूमि की स्थिति तथा आबोहवा ने मेरी राय में मानों यह तय कर दिया है कि उसकी सभ्यता ग्राम सभ्यता होगी[5] और दूसरी कोई नहीं।  
            गांधीजी चाहते हैं, हमें गांवोंवाला भारत और शहरोंवाला भारत, इन दो में से एक को चुन लेना है। गांव उतने ही पुराने हैं जितना कि यह भारत पुराना है। शहरों को विदेशी आधिपत्य ने बनाया है। जब यह आधिपत्य मिट जाएगा, तब शहरों को गांवों के मातहत होकर रहना पड़ेगा। आज तो शहरों का बोलबाला है और वे गांवों की सारी दौलत खींच लेते हैं। इससे गांवों का ह्रास और नाश हो रहा है। गांवों का शोषण खुद एक संगठित हिंसा है। अगर हमें स्वराज कि रचना अहिंसा के पाये पर करनी है, तो गांवों को उनका उचित स्थान देना होगा।[6] इसी तरह की बात गांधीजी ने ‘मनु’ से शहरों में मौजूद बड़े-बड़े कल-कारखानों के कारण ग्रामीण उद्योग के नष्ट हो जाने के संबंध में कहते हैं कि, मशीनों में जो रुपया लगाया गया है वह खाक भी हो जाये तो मुझे सहानुभूति नहीं होगी। सच्चा हिंदुस्तान तो सात लाख गांवों में बसता है। यूरोप के बड़े शहर लंदन आदि ने हिंदुस्तान को चूसा है और हिंदुस्तान के शहरों ने उसके गांवों को चूस लिया है। उसी से शहरों में ऐसे महल खड़े हुए हैं और गांव कंगाल बन गए हैं। मुझे तो इन गांवों को फिर से प्राणवान बनाना है। मैं यह नहीं कहना चाहता कि सब शहरों की सारी मिलों को तोड़-फोड़कर बर्बाद कर दो। लेकिन जहां भूले, वहां से फिर सावधान होकर चलना चाहिए। गांवों को चूसना बंद करना चाहिए और जितना अन्याय हुआ हो, उसकी बारीकी से जांच करके गांवों की आर्थिक स्थिति मजबूत बनानी चाहिए।[7] रवीन्द्र नाथ टैगोर का भी कहना  था, ‘भारत माता (गांव) को पद से गिराकर गांव के साधनों को शहरों में खींचकर नौकरानी बना दिया है।’ शहरों द्वारा उत्पादित माल का उपयोग फिर ग्रामीण अधिक कीमत चुका कर करते हैं। ग्राम संस्कृति तो अब दरिद्रता, निरक्षरता एवं पिछड़ेपन का पर्याय है। शहरों का अतिविस्तार और श्रृंगार हो रहा है। समाज वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि नगरीकरण का यही विस्तार रहा तो आने वाले समय में शायद भारत में गांव रहेंगे ही नहीं।
            गांधी नगरों की बढ़वार को एक बुराई तथा मानव जाति और दुनिया के लिए दुर्भाग्य का विषय मानते हैं। यह निश्चित रूप से, भारत के लिए दुर्भाग्य का विषय है। अंग्रेजों ने शहरों के माध्यम से भारत का शोषण किया। शहरों ने पलटकर गांवों का शोषण किया। शहरों का भवन-निर्माण गांवों के रक्त रूपी सीमेंट से हुआ है। जो रक्त आज नगरों की धमनियों में बह रहा है, वह फिर एक बार गांवों की रक्तवाहिकाओं[8] में बहने चाहिए। जब तक शहरवासी गांवों से प्राप्त शक्ति और पोषण के बदले उन्हें पर्याप्त प्रतिफल देना अपना कर्तव्य नहीं मान लेते और अपने स्वार्थवश उनका शोषण बंद न कर देते तब तक नगरवासी और ग्रामवासियों के बीच स्वस्थ और नैतिक संबंध जन्म नहीं ले पाएगा। यदि शहर के बच्चों को सामाजिक पुनर्निर्माण के इस महान कार्य में अपना योगदान करना है तो उन्हें जिन व्यवसायों के जरिये अपनी शिक्षा ग्रहण करनी है, वे प्रत्यक्ष रूप से गांवों की आवश्यकताओं से संबंधित होने चाहिए।[9] यानि बच्चों की शिक्षा भी ग्राम आधारित होने से गांव का विकास होगा।
            गांधी भारत को विनाश से बचाने के लिए, सीढ़ी के सबसे निचले भाग से काम शुरू करने की बात कहते हैं। यदि निचला भाग सड़ा हुआ है तो ऊपर और बीच के हिस्सों पर किया गया काम अंत में गिर पड़ेगा।[10] गांधी ने अनेक बार यह बात दोहराई है कि भारत उसके शहरों में नहीं बसता, बल्कि उसके 7 लाख गांवों में बसता है। लेकिन शहरवासी यह समझते हैं कि भारत शहर में बसता है और गांव केवल हमारी आवश्यकताओं  की पूर्ति करने के लिए हैं। शहरवासी कभी यह जानने का कष्ट नहीं करते कि उन निर्धन ग्रामवासियों के पास खाने और पहनने के लिए प्रयाप्त व्यवस्था है अथवा नहीं और उनके पास धूप और वर्षा से अपनी रक्षा करने के लिए कोई आश्रय-स्थली भी है या नहीं।[11] शहर अपनी देखभाल करने में स्वयं समर्थ हैं। इसलिए गांवों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्हें उनके पूर्वाग्रहों, अंधविश्वासों, संकीर्ण दृष्टिकोण आदि से मुक्त करना होगा। गांधी इसका उपाय देते हैं कि, हम उनके बीच में जाकर रहें, उसकी खुशियों और गमों में भागीदार बनें और उनके बीच शिक्षा और उपयोगी जानकारी का प्रसार करें।[12] गांधी के अनुसार नगरवासी ने आम तौर पर ग्रामवासी का शोषण किया है। सच पूछा जाए तो वह निर्धन ग्रामवासी की परवरिश पर जीता आया है। जहां तक भारतीय ग्रामवासी का संबंध है, उसके गंवारपन की पपड़ी के नीचे युगों पुरानी संस्कृति छिपी हुई है। उसकी यह पपड़ी उतार दिया जाए तथा उसकी जमाने से चली आ रही गरीबी और निरक्षरता को हटा दिया जाए, तो वह एक सुसंस्कृत, सभ्य और स्वतंत्र नागरिक का उत्तम नमूना[13] बन जाएगा।
            गांधी के अनुसार भारत को ग्राम गणतंत्रों का अनुभव है। ये अनजाने ही अहिंसा द्वारा शासित थे...अब एक जानी-बूझी अहिंसक योजना के तहत इनके पुनरुज्जीवन का प्रयास करना होगा।[14] गांधी ने ग्राम इकाई की जो धारणा बनाई उसे उन्होंने सुदृढ़तम इकाई माना है। ग्राम में लगभग 1000 की आबादी होगी। यदि ऐसी इकाई का संगठन आत्मनिर्भरता के आधार पर किया गया तो वह बहुत ही अच्छा परिणाम प्रदर्शित कर सकती है।[15] गांव का शासन पांच व्यक्तियों की पंचायत के द्वारा चलाने की बात करते हैं, जो न्यूनतम निर्धारित योग्यता रखने वाले वयस्क स्त्री-पुरुषों द्वारा प्रतिवर्ष चुनी जाए। इन पांचों के पास समस्त प्राधिकार और अपेक्षित क्षेत्राधिकार हों। वर्तमान में दंड का सामान्यतया जो अर्थ लगाया जाता है उस अर्थ में कोई दंड-प्रणाली लागू नहीं करने की बात करते हैं, इसलिए पंचायत ही अपने कार्यकाल के दौरान विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका, तीनों को स्वयं में समाविष्ट करते हुए उनके कर्तव्यों का निर्वाह करेगी।[16] गांव में पूर्ण लोकतन्त्र होगा जो व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर आधारित होगा। व्यक्ति ही अपनी सरकार का निर्माता होगा। उसपर और उसकी सरकार पर अहिंसा के नियम का शासन होगा। वह और उसका गांव सारी दुनिया की ताकत को चुनौती दे सकेंगे। कारण कि, प्रत्येक ग्रामवासी इस नियम से शासित होगा कि वह अपने और अपने गांव के सम्मान की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार रहेगा।[17] गांधी असंख्य गांवों से बने इस ढांचे में एक के बाद एक विस्तारशील किन्तु कभी ऊर्ध्वगामी न होने वाले वलय की बात करते हैं एवं जीवन एक पिरामिड की तरह नहीं होने की बात करते है जो वर्तमान में है, जिसमें आधार को शीर्ष का भार वहन करना पड़ता है बल्कि वे एक समुद्री वलय की तरह होने की बात करते है, जिसके केंद्र में सिर्फ व्यक्ति होगा जो सदैव अपने गांव के लिए मर-मिटने के वास्ते तैयार रहेगा, गांव गांव-समूहों के वास्ते नष्ट हो जाने के लिए तैयार रहेगा, और यह प्रक्रिया वहां तक चलते रहने की बात करते है, जहां संपूर्ण विश्व एक जीवन का रूप धारण कर लेगा; सभी व्यक्ति इस एक जीवन के अंग होंगे, वे कभी आक्रामक रुख नहीं अपनाएँगे बल्कि सदा विनम्रता का व्यवहार करेंगे और उस समुद्री वलय के ऐश्वर्य में भागीदार होंगे जिसकी वे अंगभूत इकाइयां हैं। गांधी इस बात को स्वीकारते हैं कि एक आदर्श गांव का निर्माण उतना ही कठिन है जितना कि आदर्श भारत का निर्माण है। लेकिन जहां एक व्यक्ति के लिए एक-न-एक दिन एक गांव को आदर्श रूप प्रदान करने की अपनी आकांक्षा को पूरा करना संभव है वहीं सारे भारत को आदर्श देश बनाने के लिए किसी एक व्यक्ति का जीवनकाल बहुत थोड़ा है। लेकिन अगर एक आदमी एक गांव को आदर्श स्वरूप प्रदान कर सकता है तो वह न केवल सारे देश बल्कि पूरी दुनिया के सामने एक नमूना पेश करेगा। सत्यशोधक को इससे बड़ी उपलब्धि की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए,[18] जो वास्तव में सबसे बड़ी उपलब्धि है।
            गांधी उस खतरे की ओर इंगित करते जो वास्तव में वर्तमान में है खतरा यह है कि, कहीं हम अपने हाथों का इस्तेमाल करना न भूल जाएं। यदि हम यह भूल गए, जमीन कैसे खोदी जाती है और मिट्टी की देखभाल किस तरह की जाती है तो समझिए हम स्वयं को भूल गए। नेता-मंत्री की तरफ भी गांधी इशारा करते हुए कहते हैं कि, यदि आप यह समझते हैं कि केवल शहरों की सेवा करके ही आप अपने मंत्री-पद को सफल सिद्ध कर सकते हैं तो आप यह भूलते हैं कि भारत वस्तुत: अपने 7 लाख गांवों में बसता है। आदमी को सारी दुनिया मिल जाए, लेकिन बदले में उसे अपनी आत्मा दे देनी पड़े तो उसके पास बचा ही क्या?[19] यदि भारतीय सभ्यता को एक स्थायी विश्व व्यवस्था के निर्माण में अपना पूरा-पूरा योगदान करना है तो गांवों में बसने वाली इस विशाल जनसंख्या को...फिर से जीना[20] सिखलाना होगा।
            गांधी गांव को व्यवस्थित करने के लिए गांवों का सर्वेक्षण कराने के पक्ष में दिखते हैं और उन चीजों की सूची तैयार कराने की बात करते हैं, जो कम से कम या किसी तरह की सहायता के बिना स्थानीय रूप से तैयार की जा सकती हैं और जो या तो गांवों के ही इस्तेमाल में आ जाएंगी या जिन्हें बाहर बेचा जा सकेगा।...इस प्रकार यदि पर्याप्त ध्यान दिया जाए तो ऐसे गांवों में जो निष्प्राण हो चुके हैं या निष्प्राण होने की प्रक्रिया में हैं, नवजीवन का संचार हो सकेगा तथा उनकी स्वयं अपने और भारत के शहरों और कस्बों के इस्तेमाल के लिए आवश्यकता की अधिकांश वस्तुओं के निर्माण की अनंत संभावनाओं का पता[21] हो सकेगा एवं ग्रामवासियों को अपने कौशल में इतनी वृद्धि कर लेनी चाहिए कि उनके द्वारा तैयार की गई चीजें बाहर जाते ही हाथों-हाथों बिक जाएं। जब हमारे गांवों का पूर्ण विकास हो जाएगा तो वहां ऊंचे दर्जे के कौशल और कलात्मक प्रतिभा वाले लोगों की कमी नहीं रहेगी। आज हमारे गांव गोबर के ढेर मात्र नजर आते हैं। कल वे सुंदर-सुंदर वाटिकाओं का रूप ले लेंगे जिनमें इतनी प्रखर बुद्धि के लोग निवास करेंगे जिन्हें न कोई धोखा दे सकेगा और न उनका शोषण कर सकेगा।...गांवों का पुनर्निर्माण अस्थायी नहीं, स्थायी आधार पर किया जाना[22] उचित होगा। गांधी चिंता व्यक्त करते हैं कि, अगर गांव नष्ट होते हैं तो भारत भी नष्ट हो जाएगा। तब भारत भारत नहीं रहेगा। दुनिया में भारत का अपना मिशन ही खत्म हो जाएगा। गांवों का पुनरुज्जीवन तभी संभाव है जब उनका शोषण समाप्त हो। बड़े पैमाने के औद्योगीकरण से अनिवार्यत: ग्रामवासियों का निष्क्रिय अथवा सक्रिय शोषण होगा, क्योंकि औद्योगीकरण के साथ प्रतियोगिता और विपणन की समस्याएँ जुड़ी रहती हैं। इसलिए गांवों को स्वत:पूर्ण बनाने पर ज़ोर देना होगा जो अपने इस्तेमाल की चीजें खुद बनाएँगे। यदि ग्राम उद्योगों के इस स्वरूप की रक्षा की जाती है तो फिर ग्रामवासियों द्वारा उन आधुनिक मशीनों और औजारों का इस्तेमाल करने पर भी कोई आपत्ति नहीं है जिन्हें वे बना सकते हों और जिनका इस्तेमाल करने की सामर्थ उनमें हो। यह जरूरी है कि उन्हें दूसरों के शोषण का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।[23] यानि बड़े उद्योगों द्वारा उसके रोजगार को न छिना जाए। गांधी प्रत्येक गांव के सभी घरों में बिजली व्यवस्था दिलाने के पक्ष में थे और उन्हें ग्रामवासियों द्वारा अपनी मशीनों और औजारों को बिजली से चलाए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन बिजली घरों का स्वामित्व या तो राज्य के पास या ग्राम समुदायों के पास रखने की बात करते हैं। लेकिन जहां न बिजली है, न मशीनें हैं, वहां खाली हाथ क्या करें?[24]   विचारणीय है।    
            हम देखते हैं कि, आजादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं और विकास कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण पुनर्निमाण के प्रयास किए गए। बावजूद इसके समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। गांव के किसानों और मजदूरों के प्रति लापरवाही बरती गई, जिसके कारण आज भी गांव दरिद्र, मूढ़ और काहिल है। आज के उद्योगपतियों ने गांवों के लोगों को उत्पादों का उपभोक्ता बना दिया है। अपने को राष्ट्र का कर्णधार कहने वाले राजनेता गांवों से अपने लिए वोट तो पाना चाहते हैं, लेकिन गांव का विकास करना नहीं चाहते हैं। बुद्धिजीवी भी गांवों की बात तो करते हैं लेकिन वहां रहना नहीं चाहते है। वर्तमान भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक एवं सामाजिक बेकारी की है। उद्योग-धंधे उजड़ चुके है। लगातार पलायन जारी है। कृषि क्षेत्र में लगे प्रत्येक व्यक्ति काम करता हुआ ही दिखता है लेकिन उससे कुछ व्यक्तियों को निकाल बाहर कर दिया जाए तो कृषि कार्य सम्पन्न होने में कोई दिक्कत नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ समिति के अनुसार इसे अदृश्य बेरोजगारी कहा जा सकता है। समिति के अनुसार, जो अपने ही धंधे में लगे हुए हैं और जो जिन संसाधनों पर काम करते हैं उनकी तुलना में इतने अधिक हैं कि यदि इनमें से कुछ किसी दूसरे क्षेत्र में काम करने के लिए खींच लिए जायें तो उसकी उत्पत्ति जरा भी नहीं घटेगी[25] एवं काम चलता रहेगा।    
            इस प्रकार हम देखते हैं की गांधी एक समर्थ-स्वावलंबी गांव की कल्पना करते हैं एवं स्वावलंबी गांवों के जरिये ही हिंदुस्तान की गरीबी-बेकारी और विषमता जैसे सवाल हल हो सकते हैं। गांधी की ग्राम दृष्टि की उपेक्षा का परिणाम देश भुगत रहा है। ऐसी परिस्थिति में गांधी की ग्राम-दृष्टि पर सतत चिंतन-मंथन की आवश्यकता है।





संपर्क: संस्कृति विद्यापीठ, अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,           वर्धा, महाराष्ट्र. (442005) मो.- 09763710526, ईमेल:chandankumarjrf@gmail.com
संदर्भ-सूची





[1] भट्टाचार्य, विवेक रंजन; 20 सूत्री कार्यक्रम: ग्रामीण भारत का बदलता स्वरूप, शान प्रिंटर्स, दिल्ली, 1983, पृ. 34
[2] Buchanun, f. an; ancient district of purnia 1809-1810, patna, 1934, p. 474      
[3] वही, पृ. 40                                                                        
[4] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-87, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पृ. 267
[5] पाण्डेय, प्रदीप कुमार; गांधी का आर्थिक एवं सामाजिक चिंतन, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1996, पृ. 29
[6] गांधीजी; हरिजन सेवक, 20-01-1940
[7] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-87,  पृ. 320
[8] हरिजन, 23-6-1946, पृ. 198
[9] हरिजन, 9-10-1937, पृ. 293
[10] गंगारडे, के. डी.; गांधी के आदर्श और ग्रामीण विकास, राधा पब्लिकेशन, नई दिल्ली, 2006, पृ. 11
[11] हरिजन, 4-4-1936, पृ. 63
[12] यंग इंडिया, 17-4-1924, पृ. 130
[13] हरिजन, 28-1-1939, पृ. 439
[14] हरिजन, 4-8-1940, पृ. 240
[15] हरिजन, 4-8-1946, पृ. 252
[16] हरिजन, 26-7-1942, पृ. 238
[17] हरिजन, 26-7-1942, पृ. 238
[18] हरिजन, 4-8-1940, पृ. 235
[19] हरिजन, 25-8-1946, पृ. 282
[20] हरिजन, 27-4-1947, पृ. 122
[21] हरिजन, 28-4-1946, पृ. 104
[22] हरिजन, 10-11-1946, पृ. 394
[23] हरिजन, 29-8-1936, पृ. 226
[24] हरिजन, 22-6-1935, पृ. 146
[25] जोशी, के. एन. एवं मिश्र, मंजुला; कृषि अर्थशास्त्र के सिद्धान्त एवं भारत में कृषि विकास, क़ॉलेज बुक डिपो, जयपुर, 2007, पृ. 26 

सामाजिक बदलाव के साधन रचनात्मक कार्यक्रम


- चन्दन कुमार, एस आर एफ (यूजीसी)
      पी -एच. डी., अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग  
                                                                                                                                             महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.  
रचनात्मक कार्यक्रम आदर्श-समाज निर्माण का साधन और साध्य है। इसका उद्देश्य समाज परिवर्तन के द्वारा एक नए समाज की रचना करना है, आंदोलन करना उद्देश्य नहीं है। इस संबंध में गांधी स्वयं कहते हैं कि, लड़ाई के द्वारा देश जीता जा सकता है, किन्तु उसे समृद्ध तो रचनात्मक कार्य के द्वारा ही किया जा सकता है।[1] इस तरह रचनात्मक कार्यक्रम समाज परिवर्तन के लिए सामूहिक प्रयत्न और लोक शिक्षण का काम करता है। गांधी की मान्यता के मुताबिक समाज परिवर्तन हिंसक जन-आंदोलन के द्वारा कभी-भी नहीं किया जा सकता है और न ही इसके जरिए टिकाऊ समाज परिवर्तन ही हो सकता है। रचनात्मक कार्यक्रम समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का बेहतर तरीका है। इस कार्यक्रम के द्वारा समाज को सिर्फ जगाने की जरूरत है। यदि समाज, रचनात्मक कार्यक्रम के उद्देश्य और फायदों के बारे में जानेगा तो अवश्य समाज में सम्पूर्ण क्रांति एवं  समाज परिवर्तन की लहर फैलने लगेगी। रचनात्मक कार्यक्रम में लगे व्यक्ति को प्रतिपक्षी से संघर्ष करने के लिए परस्पर सहयोग आदि से आत्म-शुद्धि के द्वारा आत्म-बल पैदा करने के लिए हमेशा तत्पर रहना पड़ता है। तथापि जिन दुर्गुणों के खिलाफ हम समाज में संघर्ष करेंगे उन दुर्गुणों को अपने में पालन करना न तो सत्य हो सकता और न ही अहिंसा, बल्कि वह पाखंड के घिनौने रूप में क्रियान्वित होगा।
        1941 में गांधीजी ने अपनी पुस्तक ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ की प्रस्तावना में लिखते है कि, रचनात्मक कार्यक्रम ही पूर्ण स्वराज्य या मुकम्मल आजादी को हासिल करने का सच्चा और अहिंसक रास्ता है। उसकी पूरी–पूरी सिद्धि ही संपूर्ण स्वतंत्रता है। गांधी जी ने कुल 18 प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम समाज परिवर्तन हेतु दिये और उनका मानना था कि, मेरी यह सूची पूर्ण होने का दावा नहीं करती यह तो महज मिसाल के तौर पर पेश की गई है।[2] समाज की जरूरत के हिसाब से बढ़ाये भी जा सकते हैं।
            गांधीजी का दक्षिण अफ्रीका में ही सत्याग्रह के दरमियान रचनात्मक कार्यक्रम की प्रारंभिक झलक देखने को मिलती है। जूलु विद्रोह, बोअर युद्ध और प्लेग जैसी बीमारी में घायलों की सेवा-सुश्रुषा एवं गाँवों की साफ-सफाई आदि। गांधीजी कहते हैं कि, दक्षिण अफ्रीका में समाज सेवा करना आसान नहीं था, लेकिन वहाँ जो कठिनाइयाँ सामने आती थीं, वे भारत की कठिनाइयों के मुक़ाबले में कुछ नहीं थीं। यहाँ समाज सेवक को अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता की जिन बाधाओं से लड़ना पड़ता है, उनका परिमाण बहुत ज्यादा है। रूढ़िवादी व्यक्ति बुराइयों से दूर रहकर सही रास्ते पर चलता है। लेकिन जब रूढ़िवादिता में अज्ञान, पूर्वाग्रह और अंधविश्वास आ मिलते हैं तब वह सर्वथा अवांछनीय हो जाती है।[3] भारत में भी गांधीजी ने आजादी की लड़ाई के दरम्यान रचनात्मक कार्यक्रम को साथ-साथ रखा था और उनका मानना था कि सच्ची आजादी तभी मिल पाएगी जब हम उस लायक बनेंगे। सन् 1920 में गांधीजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा रचनात्मक कार्यक्रम भारत के सामने रखा था। उस समय से इस कार्यक्रम की आवश्यकता और प्रभावोत्पादकता में उनकी श्रद्धा बढ़ती गई और इस बात पर वे अधिकाधिक ज़ोर देने लगे कि संग्राम के पहले नैतिक शक्ति को विकसित करने और अनुशासन को दृढ़ करने तथा संग्राम के बाद सुसंगठित होने के लिए और जीत के नशे या हार की उदासी से बचने के लिए रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रही के लिए आवश्यक है।[4] चूँकि सत्याग्रह में निषेधात्मक तत्वों के साथ-साथ भावात्मक मूल्य जुड़े होते हैं। इसीलिए रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रही के लिए भावात्मक पक्ष हैं। गांधी की ही तरह विनोबाजी असत्य को सत्य से, शस्त्र को वीणा से, चिल्लानेवाले को गायन और भजन से और विध्वंस के कार्य को रचनात्मक कार्य से जीतने की तकनीक देते हैं।             गांधीजी कहते हैं कि, लड़ाई के अंत में हममें निडरता आनी चाहिए और रचनात्मक कार्य के अंत में योजना-शक्ति और कार्य-शक्ति। यदि हममें योजना-शक्ति और कार्य-शक्ति न आये तो हम राज्य नहीं चला सकते। यदि हम अहिंसा से राज्य प्राप्त करें तो वह सेवा-वृत्ति से ही कायम रखा जा सकता है। किन्तु यदि हम सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से राज्य लेंगे तो वह केवल हिंसा से ही टिकेगा। उचित यह है कि हम अहिंसा की शक्ति को पुष्ट करें और सत्ता के बल त्यागें। जबतक हममें मिलकर रहने की शक्ति नहीं आती तबतक अहिंसा से स्वराज्य प्राप्त करना असंभव है। मैंने इसीलिए लोगों के सम्मुख त्रिविध कार्यक्रम रखा है।[5] रचनात्मक कार्यक्रम से सत्याग्रह आंदोलन पूर्ण, अहिंसक और सृजनशील बनता है। सत्याग्रह और रचनात्मक कार्यक्रम समाज परिवर्तन तथा सामाजिक नियंत्रण की पूरक पद्धति हैं। एक तरफ समाज में अंतर्निहित बुराई, शोषण, अन्याय और अत्याचार को सत्याग्रह द्वारा दूर किया जा सकता है वहीं दूसरी तरफ रचनात्मक कार्यक्रम द्वारा समतामूलक समाज संगठित कर सकते हैं। गांधीजी बराबर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि स्वराज प्राप्त करने के साधन के रूप में रचनात्मक काम करते रहना[6] अति आवश्यक है।           
जिस तरह समाज परिवर्तन का लक्ष्य समाज का सृजन या रचना है उसी तरह रचनात्मक कार्यक्रम का भी उद्देश्य नए समाज की रचना है और यही समाज परिवर्तन का मुख्य साधन है। रचनात्मक कार्यक्रम को दूसरे शब्दों में और अधिक उचित रीति से सत्य और अहिंसात्मक साधनों द्वारा पूर्ण स्वराज्य की यानि पूरी–पूरी आजादी की रचना कहा जा सकता है।[7] विद्यार्थियों की सभा में 18 सितंबर 1925 को भाषण में गांधीजी कहते हैं कि, समाज-सेवा के लिए सबसे पहली जरूरत चरित्र-बल कि है और समाज-सेवा करने के इच्छुक व्यक्ति में यदि चरित्र नहीं है तो वह समाज-सेवा करने योग नहीं है।[8] रचनात्मक कार्यक्रम सत्य एवं अहिंसा पर आधारित सामाजिक बदलाव है। इस संबंध में गांधीजी कहते हैं कि, यदि रचनात्मक कार्यक्रम में जीवंत श्रद्धा नहीं है तो समूहिक अहिंसा कि बात करना बेईमानी[9] होगी।
 समाज में रचनात्मक कार्यक्रम को कार्यरूप में लाना आपसी सहमती से होता है। इस काम के लिए अहिंसक पुरुषार्थ की आवश्यकता है। रचनात्मक कार्यक्रम का कार्य समाज में समझा–बुझाकर एवं  स्वंय उस दिशा में संघर्षरत एवं कार्यरत होकर करने और कराने की होती है। समाज-परिवर्तन की प्रक्रिया के बारे में विनोबा और धर्माधिकारी के विचारों को जिन तीन धारणाओं के आधार पर समझा जा सकता है- वे हैं ह्रदय-परिवर्तन, विचार-परिवर्तन और स्थिति-परिवर्तन। जो रचनात्मक कार्यक्रम के द्वारा संभव है। गांधी जी के लिए रचनात्मक कार्यक्रम का लक्ष्य ‘सर्वोदय समाज’ की स्थापना करना था, केवल अंग्रेजी सत्ता की समाप्ति नहीं।    
            गांधी जी ने हरिजन पत्रिका में लिखा है कि, मेरी राय में जिसे रचनात्मक कार्यक्रम में विश्वास नहीं है,  उसे भूख से पीड़ित करोड़ों देशवासियों के प्रति कोई ठोस भावना नहीं है और जिसमें यह भावना नहीं है, वह अहिंसक लड़ाई नहीं लड़ सकता है।[10] सच्चे सत्याग्रही की पहचान के लिए रचनात्मक कार्यक्रम वरदान स्वरूप है, उनमें अनुशासन, आत्मसंयम एवं सेवा का प्रशिक्षण ग्रहण करने या कराने की प्रयोगशाला हो जाती है। जब तक आधार सुदृढ़ नहीं होता है, उस पर अधिकार दिवास्वप्न जैसा ही प्रतीत होता है। रचनात्मक कार्यक्रम जन संपर्क का सबसे अधिक विश्वसनीय और उचित माध्यम है। गांधी की दृष्टि में, सेवा के बिना सच्ची राजनीतिक सेवा भी संभव नहीं है।[11] प्रत्यक्ष सेवा का जनता के ह्रदय पर जितना असर होता है उतना और किसी भी माध्यम का नहीं हो सकता है। यह कार्यकर्त्ताओं की सच्चाई का स्वतः सिद्ध सबूत भी है, क्योंकि यहाँ पाखंड, प्रवचन या नाटक नहीं बल्कि प्रत्यक्ष सेवा का क्रियान्वयन, मार्गदर्शन एवं कर्तव्यनिष्ठा का पालन है। गांधीजी के अनुसार, यज्ञमय जीवन कला कि पराकाष्ठा है, सच्चा रस उसी में है, क्योंकि उसमें से रस के नित्य नए झरने प्रकट होते हैं। मनुष्य उन्हें पीकर अघाता नहीं है, न वे झरने कभी सूखते है। यज्ञ यदि भाररूप जान पड़े तो यज्ञ नहीं है।[12] वे तो यहाँ तक कहते हैं कि, इस शरीर के अंदर रहने वाली आत्मा जो सेवा करने को उत्कंठित है यदि उसके लिए इस शरीर का उपयोग नहीं किया जा सकता तो मुझे उसके परिरक्षण में कोई दिलचस्पी नहीं रह सकती।[13] वे सेवक को अभिमान मुक्त रहना आवश्यक बताते हैं। सेवक को स्वप्न तक में यह खयाल नहीं आना चाहिए कि अगर वह नम्रता से, आदरपूर्वक या जी-जान से देहातियों कि सेवा करता है, तो किसी पर कोई उपकार करता है।[14] शुद्ध हृदय से किए गए सभी कार्यों का मूल्य एक जैसा ही होता है। हमें जो काम दिया गया है उससे प्राप्त होने वाला संतोष ही सच्ची भक्ति या साधना है। हमें जो सेवा करने का अवसर मिला है उसमें तन्मय हो जाना ही सच्ची समाधि है।[15] जो गरीबों कि सेवा करता है, वह अपने ऋण का हिस्सा अदा करता है।[16] नारायण मोरेश्वर खरे (10 फरवरी 1932) को पत्र में गांधीजी लिखते हैं कि, जो एक को सत्य लगता है, वह बहुत बार दूसरे को वैसा नहीं लगता, यह बात हम समय-समय पर देखते रहते हैं। किन्तु जो व्यक्ति इस तरह अपने माने हुए सत्य के अनुसार चलता है, उसे तलवार कि धार पर चलना पड़ता है।....सत्यशोधक इस चक्कर में नहीं पड़ेगा की अमुक कार्य से समाज का कल्याण होगा अथवा नहीं। वह तो कहेगा कि मैं कल्याण-अकल्याण की बात में नहीं पड़ता ; सत्य में ही सबका कल्याण है क्योंकि सत्य ही साक्षात, पूर्ण पुरूषोत्तम है।[17] जब मनुष्य में से अहंकार-वृत्ति और स्वार्थ का नाश हो जाता है तब उसके सारे कर्म स्वाभाविक और निर्दोष हो जाते हैं। वह बहुत से जंजालों से छूट जाता है।[18] गांधीजी ने यज्ञ का अर्थ माना है, अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरे के लिए, परोपकार के लिए किया हुआ श्रम अर्थात संक्षेप में `सेवा`। और जहाँ सेवा के निमित्त ही सेवा कि जाएगी वहाँ आसक्ति, राग-द्वेष नहीं होगा। ऐसी सेवा तू करता रह। ब्रह्मा ने जगत उपजाने के साथ-ही-साथ यज्ञ भी उपजाया; मानो हमारे कान में यह मंत्र फूंका कि पृथ्वी पर जाओ, एक-दूसरे कि सेवा करो और फूलो-फलो, जीवमात्र को देवता रूप जानो। इन देवों की सेवा करके तुम उन्हें प्रसन्न रखो, वे तुम्हें प्रसन्न रखेंगे।[19] समाज-सेवा का काम रोचक और तड़क-भड़कवाला काम नहीं है। उसमें परिश्रम, घोर परिश्रम करना पड़ता है। यह भी सच है कि उसमें आर्थिक दृष्टि से कोई आकर्षण नहीं होता। समाज-सेवा को मुश्किल से गुजारे लायक पैसों से ही संतोष करना पड़ता है और कभी तो वह[20] नसीब भी नहीं होता है।              
            रचनात्मक कार्य द्वारा जनता के बीच जाने का अच्छा तरीका है। इसके माध्यम से जनता के सुख–दु:ख के हम सहभागी बन सकते है। हिंसक आंदोलनकारी एक दूरवर्ती काल्पनिक राज–व्यवस्था या समाज व्यवस्था का चित्र भले ही दिखाते हो, लेकिन वह टिकाऊ समाज व्यवस्था नहीं हो सकता है। गांधीजी ने लिखा है कि, रचनात्मक कार्यक्रम का नक्शा अपने मन में खीचकर देखेंगें, तो उन्हें मेरी यह बात माननी होगी कि जिस कार्यक्रम को कामयाबी के साथ पूरा किया जाय तो उसका नतीजा आजादी या स्वतन्त्रता ही होगी, जिसकी हमें जरूरत है।[21] अहिंसक समाज रचना के लिए गांधीजी के द्वारा चलाये गए रचनात्मक कार्यक्रम में कौमी एकता, अस्पृश्यता–निवारण, शराबबंदी, खादी, दूसरे ग्रामोद्योग, गांवों की सफाई, नयी या बुनियादी तालिम, बड़ों की तालिम, स्त्रियाँ, आरोग्य के नियमों की शिक्षा, प्रांतीय भाषाएँ, राष्ट्रभाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदूर, आदिवासी, कोढ़ी और विध्यार्थी है। इन सभी रचनात्मक कार्यक्रम का अपना विशेष महत्व (स्थान) है। भाषण अनकापल्लीकी सार्वजनिक सभा में देते हुए गांधीजी कहते हैं कि, स्वराज्य के चार स्तंभों को हमेशा अपने में ध्यान रखिए। केवल खद्दर पहनिए, शराब तथा मादक वस्तुओं कि बुराई का उन्मूलन कीजिए, अस्पृश्यता निवारण कीजिए तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता और अन्तर्साम्प्रदायिक एकता के लिए काम करिए।[22] जिस कार्यक्रम से समाज में रचना हो वही रचनात्मक कार्य है। जो अनासक्ति पूर्वक कर्म का आचरण करते है वह ईश्वर का साक्षात्कार करता है।[23] गांधीजी इन रचनात्मक कार्यक्रमों के द्वारा भारत को स्वावलम्बी बनाना चाहते थे। रचनात्मक कार्यक्रम के क्रियान्वयन का मतलब स्वराज्य का ढ़ाचा खड़ा करना[24] था और उनको विश्वास भी था कि यदि सभी देशवासी रचनात्मक कार्यक्रम को पूरा करने में अपनी पूरी शक्ति लगा दें तो छ: महीने में नया भारत उपस्थित हो सकता है। देश स्वराज के लायक बनेगा तभी वह स्वराज का उपभोग कर सकता है। अगर सभी आर्थिक दृष्टि से समान नहीं होगें, तथा समाज से वंचित एवं पिछड़े वर्गों को हम नहीं अपनाएँगें तब तक राष्ट्र ऐसे ही सुलगता रहेगा चाहें वो संप्रदायिकता की आग हो चाहे गरीबी की, चाहे भ्रष्टाचार की और इस आग को बुझाना एवं एक नए राष्ट्र की रचना रचनात्मक कार्यों के द्वारा संभव है। रचनात्मक कार्यक्रम मानवाधिकारों एवं कर्तव्यों की चेतना का सूत्रपात करता है। इस तरह रचनात्मक कार्यक्रम ही शांत मूक और शुभ सामाजिक बदलाव की क्रांति हो सकती है।
                        
संपर्क: संस्कृति विद्यापीठ, अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र । मो.- 09763710526,                                        ई-मेल : chandankumarjrf@gmail.com




[1]  सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-37, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पृ.172  
[2] गांधी जी; रचनात्मक कार्यक्रम, नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, पुनर्मुद्रण, 2004, पृ.3
[3] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-28, पृ.207
[4] धवन, गोपीनाथ; सर्वोदय तत्त्व दर्शन, नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद, 1983, पृ. 210
[5] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-26, पृ.141 
[6] यंग इडिया, 2-7-1931
[7] गांधी जी; रचनात्मक कार्यक्रम, पृ.9
[8] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-28, पृ.206-7   
[9] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-75, पृ.151
[10] हरिजन, 12- 4- 1942
[11] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-28, पृ.207     
[12] वही, खंड-44, पृ.258     
[13] वही, खंड-44, पृ.156      
[14] हिन्दी नवजीवन, 24-10-1929
[15] वही, खंड-44, पृ.17      
[16] हिन्दी नवजीवन, 24-10-1929
[17] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-49, पृ.79      
[18] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-49, पृ.117     
[19] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-49, पृ.115      
[20] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-28, पृ.207     
[21] गांधी जी; रचनात्मक कार्यक्रम, पृ.10
[22] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-40, पृ.330      
[23] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-49, पृ.116      
[24] सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, खंड-75, पृ.151