Wednesday, 11 January 2017

क्षेत्रीयतावाद एवं जन-आकांक्षा


                                                                           - चन्दन कुमार, एस आर एफ (यूजीसी)
पी -एच. डी., विकास एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
भारत विविधताओं वाला देश है, जिसमें क्षेत्रीयतावाद उस छोटे-से क्षेत्र से है जो आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि कारणों से अपने पृथक अस्तित्व के लिए जागृत है।[1] राष्ट्र की तुलना में क्षेत्रवाद किसी क्षेत्र विशेष, राज्य या प्रांत से लगाव उसके प्रति भक्ति या विशेष आकर्षण है। इस दृष्टि से क्षेत्रीयतावाद राष्ट्रीय एकता का विलोम है, जिसका उद्देश्य संकुचित क्षेत्रीय स्वार्थों की पूर्ति करना है। क्षेत्रीयता विभिन्नता की उत्पाद है, जिसमें सांस्कृतिक विभिन्नता, भाषायी लगाव, भौगोलिक, ऐतिहासिक, जातीयता, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रमुख कारण हैं। भारतीय संघीय व्यवस्था में क्षेत्रीयतावाद की विशिष्ट भूमिका रही है।
          स्वतन्त्रता के पश्चात क्षेत्रीयतावाद की चेतना भारतीय राजनीति में ज्यादा सक्रिय दिखलाई पड़ती है और इसी चेतना के अंतर्गत क्षेत्रवाद को लेकर अनेक संगठित आंदोलन, प्रचार और उपद्रव भारत के अनेक क्षेत्रों में हुआ और राज्यों की जनता में क्षेत्रीय अस्तित्व की प्रबल प्रादेशिक चेतना का उदय हुआ। जो राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के कुछ मामले में बाधक के साथ-साथ पुनर्निर्माण भी रहा है। जब क्षेत्रवाद उग्र या नकारात्मक स्वरूप ग्रहण करके अलगाववादी स्थिति की ओर अग्रसर हो जाता है तो राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता प्रभावित होती है। हम देखते हैं कि, जन-आकांक्षा में क्षेत्रीयतावाद की प्रवृत्ति के अनेक रूप रहे हैं, जिसमें भारतीय संघ से पृथक होने की मांग, अपने लिए पृथक राज्य की मांग, भाषायी विवाद, अंतरराज्यीय विवाद, क्षेत्रीय आर्थिक टकराव एवं क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव आदि प्रमुख हैं, परंतु इनमें से आज क्षेत्रीयतावाद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष पृथक राज्यों की मांग है जो आज भी जारी है एवं भारतीय राजनीति को प्रभावित कर देश की एकता एवं अखंडता को खतरा उत्पन्न[2] करता रहा है।      
          यह भी देखते हैं कि, संस्कृति और भाषा की दृष्टिकोण से राज्य का निर्माण करना बुरा नहीं हुआ है। लेकिन, केवल क्षेत्रीय भावना और संकुचित स्वार्थ पर आधारित राज्य का निर्माण करना घातक ही होगा। इससे राष्ट्रीय और भावनात्मक एकता को गहरा धक्का पहुंचेगा, देश राज्यों के आपसी विवादों का अखाड़ा बन जाएगा। केंद्र के लिए अनेक नए सिरदर्द पैदा हो जाएंगे तथा देश की राजनीति अधिक विघटनकारी मोड़ ले लेगी। यदि क्षेत्रीय भावनाएं और राजनीतिक आकांक्षाओं को संतुष्ट करने के लिए ही राज्यों का निर्माण करते चला जाय तो सैकड़ों राज्यों के निर्माण से भी इस भावना[3] को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है। हमारा देश इतना विशाल है कि इनमें अनेक क्षेत्र तो बहुत अधिक विकसित हैं जबकि कई क्षेत्र बहुत पिछड़े हुए हैं। सामाजिक विषमताओं के साथ आर्थिक विषमताएँ भी सामाजिक ढांचे को प्रभावित[4] करती रही हैं।
          भारतवासी अपने देश को एक राष्ट्र मानते हैं जबकि पश्चिमी विद्वान इसे एक राष्ट्र न कहकर बहुराष्ट्र संघ का नाम देते हैं एवं विभिन्न राज्यों को राष्ट्र मानते[5] हैं। जॉन स्ट्रेची का भी मानना है कि भारत एक ऐसा नाम है जो एक राष्ट्र का ही नहीं अपितु अनेक राष्ट्रों एवं देशों के संकलन का सूचक है।[6] प्रत्येक क्षेत्र की धर्म, संस्कृति आदि भिन्न हैं और इस तरह कोई भी दो प्रादेशिक क्षेत्र परस्पर समान नहीं है। यह विशिष्टता एवं भिन्नता राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग करती है। इसी से प्रांतवाद व संकुचित प्रादेशिकता की भावना का विकास होता है एवं अपने क्षेत्र की भाषा और संस्कृति को श्रेष्ठ मानने लगता है और दूसरे की भाषा एवं संस्कृति को हीन मानने लगता है। भारत की विविधताओं जैसे की भाषा, संस्कृति, धर्म तथा संजातीयता इत्यादि तथा क्षेत्रीयता को उचित प्रतिनिधित्व देना तथा इनके साथ समान व्यवहार किया जाना भारत के विकास तथा शांति व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक[7] है। राजस्थान में मारू प्रदेश, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड, पूर्वाञ्चल, भोजपुर तथा हरित प्रदेश, मध्य प्रदेश में विंध्य प्रदेश, बघेलखंड, रेवांचल, मध्य भारत, महाकोसल व मालवा, बिहार में मिथिला, गुजरात में सौराष्ट्र, महाराष्ट्र में कोंकण, विदर्भ, मराठवाड़ा, कर्नाटक में कुर्ग, कोडागु व सागरी प्रांत, पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड व कामतापुरी, उड़ीसा में कोशल राज्य, असम में कारबी अंगलोग तथा पुर्वांचल, नागालैंड में कुकीलैंड, मेघालय में गारोलैंड तथा मिजोरम में हमर राज्य। ये सभी मांगें सजातीय व भाषायी विविधता को एक क्षेत्रीय आधार प्रदान करवाने के लिए[8] की जाती रही है। इन्हीं के भीतर कई ऐसे प्रदेश हैं जिन्हें अपनी भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक परंपरा, धार्मिक विश्वास, भाषा और बोली पर गर्व है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के दो प्रमुख क्षेत्र हैं विदर्भ और मराठवाडा। इसी प्रकार बुंदेलखंड और गढ़वाल को, उत्तर प्रदेश के दो बड़े क्षेत्रों की श्रेणी[9] में रख सकते हैं।
          हम देखते हैं कि, आजादी के बाद से भारतीय सामाजिक और आर्थिक विकास की प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण असमानताएँ व्याप्त हुई हैं। नियोजित प्रणाली द्वारा विकास के विभिन्न कार्यक्रम क्षेत्रीय अर्थतन्त्र को जहां एक ओर विकासोन्मुखी करते हैं, वहीं तीव्र बढ़ती हुई जनसंख्या और उसका नगरों की ओर पलायन समस्त परिणामों को परिवर्तित कर देता है। यही कारण है कि भारतीय समाज व अर्थतन्त्र में क्षेत्रीय विषमताएँ सदैव दृष्टिगत रही हैं। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के प्रारम्भ में अपनाई गयी नीतियों के कारण ये विषमताएँ और अधिक प्रखर[10] रूप धारण कर चुकी है। इस तरह विकास की क्षेत्रीय असमानता मानवकृत है। भारत में भाषाई, धार्मिक, शैक्षिक, वर्ग, जाति आदि की असमानताओं के साथ-साथ विकास की क्षेत्रीय असमानताएँ एवं विषमताएँ विद्यमान हुई है। भारत के राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में यह स्पष्ट देखने को मिल रहा है। आर्थिक विकास के दृष्टिकोण से इनमें अनेक असमानताएँ हैं, जिसे दो भागों में बाँट कर देखा जा सकता है- अंतर्राज्यीय और अंत:राज्यीय। अन्तर्राज्यीय असमानताओं का तात्पर्य यह है कि विभिन्न राज्यों या प्रदेशों के बीच असमानताएँ एवं अंत:राज्यीय असमानताओं का अर्थ है, एक ही राज्यों या प्रदेशों के विभिन्न जिलों, खंडों या प्रादेशिक इकाइयों के बीच असमानताओं का होना। भारत में स्थित उड़ीसा, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, केरल आदि आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं, वहीं पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्य अधिक विकसित हुए।   
          क्षेत्रीयवाद को जन्म देने वाले अनेक कारण है स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद राज्यों का जब पुनर्गठन हुआ तो अंग्रेजों द्वारा लादी गई पुरानी सीमाओं को भुलाकर नहीं किया गया था, बल्कि उनको पुनर्गठन का आधार बनाया गया। इसी कारण एक राज्य में रहने वाले लोगों में एकता की भावना नहीं आ पाई। प्राय: भाषा और संस्कृति क्षेत्रीयवाद की भावनाओं को उत्पन्न करने में बहुत सहयोग देते हैं। तमिलनाडु के निवासी अपनी भाषा और संस्कृति को भारतीय संस्कृति से श्रेष्ठ मानते हैं। वे राम और रामायण की कड़ी आलोचना करते हैं। 1975 में उन्होंने तमिलनाडु में कई स्थानों पर राम-लक्ष्मण के पुतले जलाए। 1960 में इसी आधार पर उन्होंने भारत से अलग होने के लिए व्यापक आन्दोलन[11] किया था। क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में इतिहास का दोहरा सहयोग रहा है- सकारात्मक और नाकारात्मक। नार्मन डी. पामर का विचार है कि भारत की अधिकांश राजनीति क्षेत्रीयवाद और भाषावाद के बहुत-से प्रश्नों के चारों ओर घूमती है। क्षेत्रीयवाद की समस्याएँ स्पष्ट रूप से भाषा से संबन्धित हैं। भारत में सदैव ही अनेक भाषाएँ रही हैं और विभिन्न भाषाएँ बोलने वालों ने कई बार अलग राज्य के निर्माण के लिए व्यापक आंदोलन किए।
          क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में जाति की भी प्रधानता है। जिन क्षेत्रों में किसी एक जाति की प्रधानता रही है, वहीं क्षेत्रीयवाद का उग्र रूप देखने को मिला है। जहां किसी एक जाति की प्रधानता नहीं रही, वहां पर एक जाति ने दूसरी जाति को रोके रखा है और क्षेत्रीयता की भावना इतनी नहीं उभरी। यही कारण है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में क्षेत्रीयवाद का उग्र स्वरूप देखने को मिला, जबकि उत्तर प्रदेश में नहीं मिलता है।[12] क्षेत्रीयवाद को बढ़ाने में धर्म भी सहायक होता है। पंजाब में अकालियों की पंजाबी सूबा की मांग कुछ हद तक धर्म के प्रभाव का परिणाम था। यही हाल कश्मीर[13] का भी है। एक तरफ आर्थिक विकास में काफी असमानता रही है। कुछ प्रदेशों का आर्थिक विकास बड़े पैमाने पर किया गया और कुछ प्रदेशों का नगण्य ही रहा। जिन व्यक्तियों के हाथों सत्ता रही उसने अपने क्षेत्रों की ओर ज्यादा से ज्यादा विकास पर ध्यान दिया। 1966 से पूर्व पंजाब में सत्ता पंजाबियों के हाथों में रही, जिस कारण हिसार, गुड़गांव, महेन्द्रगढ़, जींद आदि क्षेत्रों का विकास न के बराबर ही रहा। आंध्र प्रदेश में सत्ता मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के नेताओं के पास रही, जिस कारण तेलंगाना पिछड़ा ही रहा। उत्तर प्रदेश में पूर्वी उत्तर प्रदेश पिछड़ा रह गया, राजस्थान में पूर्वी राजस्थान अविकसित रह गया और इसी प्रकार महाराष्ट्र में विदर्भ का विकास नहीं हो पाया। अत: पिछड़े क्षेत्रों में यह भावना उभरी कि यदि सत्ता उनके पास होती तो उनके क्षेत्र पिछड़े न रह जाते। इसीलिए इन क्षेत्रों के लोगों में क्षेत्रीयवाद कि भावना उभरी और उन्होंने अलग राज्य की मांग[14] रखी। कई राजनीतिक दल यह सोचकर क्षेत्र को अलग राज्य बनाए जाने की मांग करते हैं कि उससे सत्ता हाथ आएगी और अपनी महत्त्वाकांक्षाएँ पूर्ण होगी। क्षेत्रीयतावाद से राजनीतिक खेल भी खेला जाता रहा है, क्षेत्रीयतावाद को आधार बनाकर राज्य केंद्रीय सरकार से सौदेबाजी भी करता है। इस तरह के सौदेबाजी से लाभ भी होता है एवं हानि भी। सौदेबाजी न केवल आर्थिक विकास के लिए होता है, बल्कि महत्वपूर्ण समस्याओं को सुलझाने के लिए भी किए जाते हैं। अपने-अपने चुनावी क्षेत्र के विकास पर ज्यादा-से-ज्यादा ध्यान मंत्रिपरिषद के सदस्य गण देते हैं क्योंकि अपनी जीत पक्की कर सके। मतदान के पहले क्षेत्रीयता का सहारा लेकर राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चुनाव करते हैं एवं क्षेत्रवाद की भावना को भड़काकर मत वटोरते हैं। कुछ राजनीतिक दल क्षेत्रीयता का सहारा लेकर हिंसक गतिविधियों को उभार कर लोकप्रियता का साधन बना लेते हैं। मंत्रिमंडल गठन में भी क्षेत्रीयता की प्रवृत्ति दिखती है। प्राय: मुख्य क्षेत्र के प्रतिनिधियों को मौका मिलता है। अब तक शिकायत प्रधान मंत्री के पद को लेकर होता है कि दक्षिणी राज्यों से नहीं बना है।
          इस तरह हम देखते हैं कि, क्षेत्रीयवाद उस समय तक जटिल समस्या उत्पन्न नहीं करता जब हद में रहता है लेकिन जब यह भावना उग्र रूप ग्रहण कर लेता है तब यह राष्ट्रीय एकता के लिए भयानक होता है। सेलिग एस. हेरिसन ने इस खतरे के बारे में कहा है कि, ‘यदि क्षेत्रीयवाद की भावना या किसी विशेष क्षेत्र के लिए अधिकार या स्वायत्तता की मांग बढ़ती चली गई, तो इससे या तो देश अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बंट जाएगा या तानाशाही कायम हो जाएगी।’[15] रजनी कोठारी का मानना है कि सिर्फ भाषा को आधार बनाकर राज्यों का पुनर्गठन नहीं करना चाहिए इसके अतिरिक्त आकार, विकास की स्थिति, सामाजिक एकता, शासन की सुविधा तथा राजनीतिक व्यवहारिकता पर ध्यान देना चाहिए। यों तो राज्य की मांग विकेन्द्रीकरण का मार्ग है। फिर भी जनता एवं क्षेत्र की स्थिति को ध्यान में रखते हुए एवं राजनीति न करते हुए जनता की आकांक्षा को नकारना विकास की स्वतंत्र मानसिकता को लाभ के बदले हानि पहुंचाना है। इसलिए जन-आकांक्षा को भी नकारा नहीं जा सकता है।  

संपर्क :  विकास एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, पंचटीला वर्धा,                         महाराष्ट्र (442005), मो. नं. 9763710526, ई-मेल: chandankumarjrf@gmail.com


संदर्भ-सूची



[1] सेंगर, शैलेन्द्र; भारतीय राजनीति उभरते मुद्दे, पुष्पांजलि प्रकाशन, दिल्ली, 2006, पृ. 178
[2] जैन, राजेश; क्षेत्रीयतावाद और भारतीय राजनीति, भावना प्रकाशन, दिल्ली, 2004, पृ. 11
[3] सिंह, विरकेश्वर प्रसाद; भारतीय राजनीतिक व्यवस्था, ज्ञानदा प्रकाशन (पी. एंड डी.), नई दिल्ली, 2010, पृ. 300
[4] शर्मा, सुरेन्द्र कुमार; संविधान और सरकार, डिस्कवरी पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 2007, पृ. 123
[5] पाण्डेय, गणेश; भारतीय समाज, राधा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, 2008, पृ. 229
[6] वही;
[7] शर्मा, संजय; संघवाद और क्षेत्रीय आकांक्षाएँ, भारत में राजनीतिक प्रक्रियाएं,  सं., बी. एन. चौधरी एवं युवराज कुमार, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय दिल्ली विश्वविद्यालय, अप्रैल, 2013, पृ. 76 
[8] वही, पृ. 90  
[9] जैन, राजेश; उपरिवत, पृ. 18 
[10] वही, पृ. 18-19
[11] सेंगर, शैलेन्द्र; उपरिवत, पृ. 185
[12] वही;
[13] वही;
[14] वही, पृ. 186   
[15] सेंगर, शैलेन्द्र; उपरिवत, पृ. 188

Thursday, 29 September 2016

गांधी और मानवाधिकार

गांधी और मानवाधिकार
     - चन्दन कुमार, एसआर एफ (यूजीसी)
पी -एच. डी. ,अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
 गांधी मानवाधिकार शब्द को लेकर अपने दर्शन में चर्चा को नहीं रखा है। गांधी ने खंड-खंड में मानवाधिकार शब्द को रखा है। गांधी अधिकार पर बल न देते हुए कर्त्तव्य के पालन पर जोर देते हैं, सब लोग कर्त्तव्य का पालन ठीक ढंग से करे तो अधिकार की प्राप्ति में समय नहीं लगेगा। एक तरफ देखते हैं कि, मानवाधिकार का सार्वभौम घोषणा 10 दिसंबर, 1948 को सार्वजनिक रूप से प्रकाश में आया, जबकि गांधी की मृत्यु 30 जनवरी, 1948 को ही हो जाती है। गांधी जीवित रहते तो जरूर मानवाधिकार एवं मानवाधिकार घोषणा के बारे अपना मंतव्य देते। फिर भी गांधी के विचारों को मानवाधिकार की कसौटी पर परखने से पहले मानवाधिकार की सार्वभौम घोषणा का उल्लेख किया जाना जरूरी है क्योंकि इसके बिना गांधी के विचारों एवं कार्यों में मानवाधिकार को नहीं परखा जा सकता है। सार्वभौम घोषणा में 30 अनुच्छेद हैं, जिसमें मुख्य हैं; जन्मजात स्वतन्त्रता एवं समानता, कोई भेद भाव नहीं, प्राण एवं देहिक सुरक्षा, दासता एवं गुलामी से मुक्ति, अमानवीय व्यवहार के प्रति प्रतिसेद्ध, कानून के समक्ष समान, धर्म, शिक्षा, संपत्ति का अधिकार, इत्यादि।
          मानवाधिकार दो शब्दों के मेल से बना शब्द है, मानव और अधिकार। गांधी का मानना है कि मानव शरीर, बुद्धि और आत्मा का सामंजस्यपूर्ण संयोग होते हुए सत्य या ईश्वर का एक छोटा-सा रूप है, जिसमें आत्मा और शरीर के सभी गुण पाये जाते हैं। आत्मा के कारण ही मानव में चैतन्य, बुद्धि, संकल्प, भाव और संवेग पाये जाते हैं। शरीर धारण से मानव प्राकृतिक नियमों का पालन करता है अर्थात पूर्वजों के कारण शरीर धारण होता है एवं उसमें आनुवंशिकता के गुण आते हैं तथा विकास के लिए वातावरण से प्रभावित होते हैं। गांधी मानव के विकासात्मक स्वरूप को स्वीकारते हैं। शुरू में मानव पशु रूप में था, जिसके कारण पशुओं की भांति ही आहार, निंद्रा, भय, मैथुन आदि प्रवृतियाँ मौजूद थीं। अपने विकास के कारण ही पशुओं से भिन्न हुए हैं। पशुओं में नैतिक चेतना, धार्मिक चेतना एवं इंद्रिय-नियमन का अभाव है। मनुष्य शुभ-अशुभ का भेद करता है, अपने इंद्रियों को नियंत्रित करता है। गांधी मानते हैं कि मनुष्य इस हाड़-मांस के शरीर में आबद्ध रह कर न तो ज्ञान और न सदगुणों की ही पूर्णता को प्राप्त कर सकता है और न ही स्वार्थ को जीत सकता है, फिर भी पूर्णता की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है। गांधी मानव को आत्म-प्रधान जीव मानते हैं जो शरीर से जुड़ा होता है। आत्मा के कारण ईश्वर से संबंधित होता है। अत: उसमें शरीरजन्य, बुराइयाँ, आत्मा से संबंधित सद्गुण और ईश्वर की अनंत संभावनाएँ अवियोज्य रूप से एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं। इसीलिए मनुष्य शुभ-अशुभ दोनों का सम्मिश्रण है। गांधी के शब्दों में “हममें से प्रत्येक व्यक्ति शुभ और अशुभ का सम्मिश्रण है। क्या हममें पर्याप्त मात्रा में बुराई नहीं हैं? अवश्य हैं।” (हरिजन, 10.6.39, पृ. 185) गांधी को मनुष्य के स्वभाव में अशुभ की अपेक्षा शुभ विशेष शक्तिशाली नजर आता है। मनुष्य में प्रेम, सहयोग, उपकारिता आदि की तुलना में हिंसा, स्वार्थ और लोभ की शक्ति बहुत ही क्षीण जान प्रतीत होता है तथा प्रेम की शक्ति के बिना दुनिया टिक ही नहीं सकती है। इसी प्रेम की शक्ति से अनेक युद्धों के बाद भी दुनिया एवं विश्व में जीवन कायम है। संपूर्ण मानवता की तुलना में बुराइयाँ समुद्र की विशाल जल राशि में चंद बूंदों के समान है। गांधी यह भी कहते हैं कि कोई भी मानव ऐसा नहीं है जिसकी बुराई का सुधार नहीं हो सके। गांधी के अनुसार मनुष्य का उद्देश्य अधिक-से-अधिक ईश्वरीय शक्ति को प्राप्त करना है। ईश्वर सभी जीवों का समूह है अत: ईश्वर या मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग समाज की गरीबी, बेरोजगारी, विषमता, शोषण और दु:खों को मिटाना ही हो सकता है।
          गांधी के अनुसार अधिकारों की प्राप्ति समाजोपयोगी कर्त्तव्यों की पूर्ति के द्वारा ही संभव है। अधिकारों की गांधीय अवधारणा मूल प्राकृतिक एवं नैतिक अधिकारों का उद्घोष माना जा सकता है। गांधी ने कर्त्तव्यों एवं अधिकारों के पारस्परिक संबंध के आधार पर नैतिक न्याय की प्रकृति की अवधारणा प्रस्तुत की है। कर्त्तव्यों के बिना कोई वास्तविक अधिकार की प्राप्ति नहीं हो सकती है। उनके अनुसार कर्त्तव्यों का सही पालन ही अधिकारों का सही स्त्रोत है। कर्त्तव्यों के सही निर्वाह के बिना कोई वास्तविक अधिकार नहीं प्राप्त किया जा सकता है, इसीलिए अधिकारों के साथ-साथ कर्त्तव्यों की पूर्ति मानव समाज में रामराज्य बनाए रखने के लिए आवश्यक है। कर्त्तव्य को गांधी ‘स्वधर्म’ की श्रेणी में रखते हैं। वहीं अधिकार का उद्देश्य स्वार्थ सिद्धि न मानकर मनुष्य सेवा या समाज सेवा को मानते हैं। इस तरह गांधी ने तिलक के वो शब्द जिसमें तिलक कहते हैं कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैं में गांधी कहते है कि इसे बनाए रखना हमारा पवित्र कर्त्तव्य है। गांधी मनुष्य की प्रवृत्ति से परिचित दिखाई पड़ते हैं इसीलिए उन्होंने कर्त्तव्यों के पालन हेतु व्रत के पालन पर जोर देते हैं, क्योंकि पहले मानव को मानव रूप में पहचान की आवश्यकता है, जिस दिन मनुष्य अपने आप को पहचान लेगा, तब कर्त्तव्य का निर्वाह भी सही से हो पाएगा।
          इसीलिए गांधी एकादश जैसे व्रत समाज के सामने देते प्रतीत होते हैं। जिसमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अभय, शरीरश्रम, स्वदेशी, अस्पृश्यता निवारण, सर्वधर्म समभाव सम्मिलित है। इस एकादश व्रत के पालन से मानव को मानव के अधिकार मिलते प्रतीत होते हैं। सत्य को गांधी ईश्वर मानते हैं। अहिंसा का पालन मन, वचन और कर्म से पालन की बात करते है। अस्तेय में किसी भी प्रकार की चोरी को निषेध करने की बात करते हैं। अपरिग्रह में आवश्यकता से अधिक संपत्ति को वर्जित मानते हैं। ब्रह्मचर्य को समाजसेवा के लिए उपयोगी मानते हैं। अस्वाद को ब्रह्मचर्य पालन एवं शरीर की दृष्टि से उपयोगी मानते हैं। अभय में सत्य के आग्रही को निडर बनने की बात कहते हैं। शरीरश्रम में रोटी के लिए श्रम की बात कहते हैं, यानि सभी के लिए शरीरश्रम अनिवार्य की बात कहते है और यह भी कहते हैं कि जो शरीरश्रम किए बिना खाता है चोरी का अन्न खाता है। स्वदेशी व्रत में गांधी का विचार है कि सभी लोग स्वदेशी को अपनाए और आवश्यकता की वस्तुएँ यहीं पैदा हो और उसे उपयोग में लाया जाय तो नया भारत रोज उपस्थित होगा, एक तरह से यह पड़ोसी से प्रेम का व्रत है। अस्पृश्यता निवारण को गांधी व्रत के रूप में अपनाने की बात करते है। यानि सामाजिक सौहार्द की बात करते दिखते हैं। सर्वधर्म समभाव में सभी धर्म की अच्छी बातों को ग्रहण करने की बात करते हैं एवं सभी धर्मों को समान मानने से है, यानि आज जो धर्म से उत्पन्न समस्या दिखती है उसके निवारण की बात है। इस तरह एकादश व्रत का पालन मानवाधिकार की प्राप्ति है।
          गांधी सामाजिक समस्या से चिंतित नजर आते हैं। सामाजिक समस्या मानवाधिकार का हनन करती है। गांधी रचनात्मक कार्यक्रमों यानि कर्त्तव्य के पालन द्वारा मानवाधिकार की प्राप्ति करते दिखते हैं। गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम में अठारह प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम शामिल है। कौमी एकता, अस्पृश्यता निवारण, शराबबंदी, खादी, ग्रामोद्योग, गांवों की सफाई, नई या बुनियादी तालिम, बड़ों की तालिम, स्त्रियाँ, आरोग्य के नियम, प्रांतीय भाषा, राष्ट्रभाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदूर, आदिवासी, कोढ़ी और विद्यार्थी। यहाँ हम देखते हैं कि, गांधी मानव के अधिकार प्राप्ति के लिए कौमी एकता की बात करते हैं। कौमी एकता नहीं होने के कारण ही सांप्रदायिक हिंसा जैसी मानवीय अत्याचार होते रहते हैं। अस्पृश्यता जैसी अमानवीय व्यवहार सदियों से चली आ रही है, जो भेद भाव को जन्म देती है। इसके निवारण की बात करते हैं। शराबबंदी में भी मानवाधिकार की बातें समाहित है ज्यादातर पारिवारिक कलह शराबखोरी से होती है जिसमें ज़्यादातर महिलाओं के अधिकार का हनन होता है। इसलिए गांधी शराबबंदी को अपने कर्त्ताव्यों में शामिल अधिकारों की रक्षा के लिए करते हैं। इस तरह गांधी के सारे रचनात्मक कार्यक्रम भी अधिकारों की प्राप्ति हेतु कर्त्तव्य दिखते हैं।
          गांधी रस्किन की अनटु दिस लास्ट पुस्तक को पढ़कर बहुत प्रभावित होते है और वे 1908 में सर्वोदय नाम से गुजराती भाषा में उस पुस्तक को समाज के सामने रखते हैं एवं उस दिशा की ओर अग्रसर दिखते हैं। मैं कहूँ कि गांधी का सर्वोदय दर्शन एवं कार्य मानवाधिकार की प्राप्ति है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। सब का उदय, सब के द्वारा उदय एवं सब तरह से उदय सर्वोदय है। सब का उदय सर्वोदय का लक्ष्य है, सब के द्वारा उदय सर्वोदय का साधन है, सब तरह से उदय इसकी विशेषता या अधिकार है। इस पुस्तक में मुख्य रूप से तीन बातों पर गौर किया जाय तो गांधी के मानवाधिकार संबंधी बातें और भी स्पष्ट होंगी। पहला, सबों की भलाई में ही अपनी भलाई है। दूसरा, श्रमिक, किसान एवं मजदूर का जीवन ही सच्चा जीवन है। तीसरा, नाई और वकील के काम की कीमत एक जैसी है।
          गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धान्त मानवाधिकार की रक्षा करते नजर आता है। ट्रस्टीशिप (न्यासिता) शब्द अंग्रेजी के ‘ट्रस्ट’ शब्द से बना है। ट्रस्ट की अवधारणा जमीन और अन्य संपत्ति को सुरक्षित या संरक्षक के रूप में लिया जाता है। पृथ्वी पर मनुष्यों के उपयोग में आने वाली सारी संपत्ति पर किसी एक या सीमित व्यक्तियों का ही हक नहीं है, संपत्ति पर सबों का बराबर हक है, हम सिर्फ उस संपत्ति के न्यासी (रक्षक) हैं। जिस तरह सूर्य कि रोशनी और हवा पर अपना कोई अधिकार नहीं है, उसी तरह भूमि पर भी अपना कोई अधिकार नहीं है। गांधीजी संपत्ति को समाज की धरोहर के रूप में देखते थे। गांधी के अनुसार कोई भी व्यक्ति चाहे वह शाहजादा हो या व्यापारी वंशगत या स्वअर्जित संपत्ति का स्वंय मालिक नहीं हो सकता और न ही इस संपत्ति के मामले में उसका स्वैच्छिक अधिकार हो सकता है। वर्तमान असमानताएँ निश्चय ही लोगों के अज्ञान के कारण हैं। लोगों का अपनी स्वाभाविक शक्ति का ज्ञान जैसे ही बढ़ेगा असमानताओं का खात्मा होना लाजिमी है। हरिजन सेवक में गांधी जी ने लिखा है कि, ट्रस्टीशिप का अंतिम मसविदा इस बात का प्रमाण है कि इसमें पूंजीवाद की गुंजाइश ही नहीं है। बल्कि मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था को यह समतावादी व्यवस्था में बदलना चाहता है, जहाँ संपत्ति के व्यक्तिगत स्वामित्व का कोई अधिकार ही स्वीकार नहीं है। गांधीजी भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट से परिचित थे और साफ-साफ कहा था कि, अहिंसा कि सफलता के क्षेत्र में सबसे बड़े बाधक हमारे देश में उपस्थित अमीर लोग, सट्टेबाज, भूस्वामी, दस्तावेज़ बनानेवाले, कारखानेदार, आदि हैं। वे सब शायद नहीं समझते हैं कि, वे जनता के खून चूस कर ही जी रहे हैं। इस तरह गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धान्त मानवाधिकार की प्राप्ति का माध्यम है।
          गांधी विकेन्द्रीकरण के समर्थक हैं, केन्द्रीकरण के कारण ही ज़्यादातर आजादी छिनती है। गांधी राज्य को घनीभूत हिंसा की जड़ मानते हैं। सांसद को भी वे बांझ एवं वेसवा मानते हैं। ये मनुष्य के अधिकार का हनन करती है।
          गांधीजी का मानवाधिकार लड़ाई दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान से ही दिखलाई पड़ता है, जहां वे गिरमिटिया मजदूर को अपने अधिकार की प्राप्ति दिलाने हेतु लड़ाई छेड़ते हैं। बोअर युद्ध एवं जूलु विद्रोह में घायलों की सेवा एवं दवाई की व्यवस्था करते नजर आते हैं। भारत में 1917 के चंपारन सत्याग्रह द्वारा मानवाधिकार की रक्षा करते नजर आते हैं। जहां बहुत पहले से ही तीन-कठिया प्रथा लादी गई थी। नील की खेती अनिवार्य कर दिया गया था। अंग्रेज अनेक प्रकार के कर वसूल किया करते थे। कर अदा नहीं किए जाने पर अनेक प्रकार के जुल्म ढाये जाते थे। इनसे निजात दिलाते है। 1918 में अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन में मजदूरों के हक दिलाते नजर आते हैं। 1918 में खेड़ा सत्याग्रह के दौरान किसानों को अपना हक दिलाते हैं।
          भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में 1920 में असहयोग आंदोलन का छेड़ा जाना मानवाधिकार की लड़ाई थी। जो अहिंसक तरीके से लड़ी गयी है उसमें गांधी कोई भी प्रकार की हिंसा नहीं चाहते थे। लेकिन चोरी चोरा नामक स्थान पर थाने में 21 पुलिस कर्मियों को आंदोलनकारियों द्वारा जिंदा जला देने से गांधी अपने असहयोग आंदोलन को वापस ले लेते हैं। इससे साफ जाहीर होता है गांधी मानवाधिकार की रक्षार्थ भी खड़े होते हैं। 1930 का सविनय अवज्ञा आंदोलन मानवाधिकार की ही लड़ाई थीं, जिसमें अपनी मांगों के साथ-साथ नमक पर बढ़े कर को समाप्त कराया। 1931-32 में नौ महीने तक दलितोत्थान पर कार्य करना एवं उसे अधिकार दिलाना मानवाधिकार की प्राप्ति की लड़ाई थी। 1942 में करो या मारो का नारा देना अंग्रेजी दासत्व से मुक्ति का आंदोलन था। आजादी के समय नौआखाली में सांप्रदायिक हिंसा को शांत एवं सामाजिक सौहार्द करते नजर आते हैं। नि:सस्त्रीकरण, शांतिसेना, विश्वसरकार की बातें करना मानवाधिकार की रक्षा करना था।
          इन सब से भिन्न गांधी सत्याग्रह जैसे अहिंसक अस्त्र अपने अधिकार की प्राप्ति के लिए देते हैं। इसमें किसी का कोई नुकसान नहीं होता, प्रतिपक्षी का सिर्फ हृदय परिवर्तन किया जाता है। इस तरह हम देखते हैं कि गांधी अपना सारा जीवन मानवाधिकार की प्राप्ति में अपने विचार और कार्य को रखते हैं एवं अपने जीवन के अंतिम दिनों तक मानवाधिकार की रक्षार्थ खड़े रहते हैं।

संपर्क: अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, पंचटीला वर्धा,         महाराष्ट्र- 442005, मो.- 9763710526, ई-मेल: chandankumarjrf@gmail.com
           


Thursday, 22 October 2015

स्मार्ट सिटी या आत्मा का कब्रिस्तान


       - चन्दन कुमार, एस आर एफ (यूजीसी)
पी -एच. डी., विकास एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
         
     स्मार्ट सिटी आत्मा का कब्रिस्तान है। भारत कृषि प्रधान गांवों का देश है। भारत की आत्मा गांव में निवास करती है एवं भारत माता ग्राम वासनी रही है। स्मार्ट सिटी एक साजिश है, गांव को पूर्ण रूप से उजाड़ने के लिए, ऐसा जान प्रतीत होता है। आज भी कई गांव बिजली, पानी, सड़क और उन्नत कृषि जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित है। शहरीकरण का ही परिणाम गांवों को उजाड़ने के लिए काफी दिख पड़ता है, उसमें अब सरकार का कार्यान्वयन एवं घोषणा स्मार्ट सिटी बनाने की तो ये गांव के लिए काफी नुकसानदेह साबित होगा। स्मार्ट सिटी, पुराने शहरों को चुनकर स्मार्ट सिटी में तब्दील करने की है। यानि शहरों का अति विस्तार और श्रृंगार स्मार्ट सिटी है। स्मार्ट सिटी में आम लोगों की जरूरत की हर सुख-सुविधा उपलब्ध कराने की है। 
            स्मार्ट सिटी के प्रमुख अवसंरचना तत्वों में शामिल है- प्रयाप्त जलापूर्ति, सुनिश्चित विद्युत आपूर्ति, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन सहित सफाई, सक्षम शहरी गतिशीलता और सार्वजनिक परिवहन, गरीबों के लिए किफायती आवास, सक्षम आईटी कनैक्टिविटी और डिजिटेलाइजेशन, सुशासन के अंतर्गत ई-गवर्नेंस और नागरिक भागीदारी, सुस्थिर पर्यावरण, महिलाओं, बच्चों और वृद्ध नागरिकों की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य और शिक्षा। स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए आर्थिक विकास करना, बेहतर स्थानीय क्षेत्र विकास और प्रौद्योगिकी का उपयोग शामिल है। क्षेत्र आधारित विकास स्लमों समेत विद्यमान क्षेत्रों (रिट्रोफिट और पुनर्विकास) को बेहतर नियोजित क्षेत्रों में बदल कर, संपूर्ण शहर की वास-योग्यता में इजाफा करना। शहरी क्षेत्रों में बढ़ रही जनसंख्या को स्थान मुहैया कराने के लिए शहरों के आस-पास नए क्षेत्रों (हरित क्षेत्र) को विकसित करना। स्मार्ट समाधानों के प्रयोग से शहरी अवस्थापन और सेवाएं बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी जानकारी और आकड़ों का उपयोग करना। इस तरह के तरीके से व्यापक विकास, जीवन की गुणवत्ता बढ़ाना, रोजगार उत्पन्न करना और सभी के लिए विशेष तौर से गरीबों और वंचितों की आय बढ़ाते हुए समावेशी शहरों का मार्ग प्रशस्त करना। स्मार्ट सिटी की विशेषता में बेशुमार रहेगा- मिश्रित भूमि उपयोग को बढ़ावा, भीड़भाड़, वायु प्रदूषण एवं संसाधन विलोपन को कम करना, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना, परस्पर वार्तालाप तथा सुरक्षा सुनिश्चित करना, नागरिकों की जीवन गुणवत्ता बढ़ाना, क्षेत्रों में शहरी गर्मी के प्रभाव को कम करने तथा सामान्यतया पारिस्थितिकी की संतुलन को बढ़ावा देने के लिए खुले स्थानों, पार्कों, खेल के मैदानों और मनोरंजनात्मक स्थानों को परिरक्षित और विकसित करना, परिवहनोन्मुखी विकास, सार्वजनिक परिवहन और अंतिम दूरी पैरा परिवहन कनैक्टिविटी को बढ़ावा देना, ऑनलाइन मानीटरिंग, मोबाइल का उपयोग, नगर कार्यालयों में जाए बिना सेवाएँ प्रदान करना, स्थानीय आहार, स्वास्थ्य, शिक्षा, कला-कृतियों और शिल्प-संस्कृति, खेल की वस्तुओं, फर्नीचर, हौजरी, वस्त्र, डेरी इत्यादि जैसे इसके मुख्य कार्याकलापों के आधार पर शहर को एक पहचान देना, क्षेत्रों को आपदाओं से सुरक्षित बनाना, कम संसाधनों का उपयोग करना और सस्ती सेवाएं प्रदान करना है।  
            शहरीकरण का ही परिणाम रहा कि लधु एवं कुटीर उद्योग गांवों से पलायन कर शहरों में बड़े पैमाने पर बड़े उद्योगों के रूप में धारण कर लिया। आज गांव के किसान सिर्फ खेती के बल पर किसी तरह जीवित है। कृषि व्यवस्था दम तोड़ रही है। कृषि लागतों तथा उत्पादों पर कई तरह के संरक्षण और सबसिडियां उपलब्ध कराई जाती रही, इनमें से अधिकांश लाभान्वित होने वाले बड़े किसान एवं भू-माफिया ही रहते है। भूमि सुधारों को लागू न किए जाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विषमता के आधारों में लगातार विस्तार हुआ और देश की व्यापक कृषि आबादी, जिनमें बड़ा हिस्सा भूमिहीन मजदूरों के रूप में काम करने वालों का है, निरंतर पलायन के कारण कृषक के लिए गंभीर समस्या है। लागत मूल्य भी ऊपर कर पाना किसी-किसी किसान के लिए संभव नहीं हो पाता है। जिसके परिणामस्वरूप आज हमें किसान आत्महत्या के रूप में देखने-सुनने को मिल जाता है। इस तरह देश के किसानों-मजदूरों और कारीगरों के प्रति की गयी लापरवाही ने गांव को दरिद्र, मूढ़ और काहिल बनाकर छोड़ा है। गांवों के प्रतिनिधि, उनके हितों का पोषण करनेवाले नहीं, बल्कि उनके शोषक बनकर रह गए है। श्री हिगिन बॉटम ने कहा था कि, भारत के अधिकतम लोग गरीबी के शिकार हैं। आबादी के दशांक का मुश्किल से एक वक्त और वो भी सूखी रोटी और चुटकी भर नमक खाकर रहना पड़ता है....आज भारत की स्थिति यह है कि यदि आप दूर देहात के भीतरी हिस्से में जाएं तो वहां देखेंगे कि गांव-गांव नहीं कुड़े का ढेर बनते जा रहे हैं, वहां ग्रामीण नहीं चील और गिद्ध रहते हैं, क्योंकि ग्रामीण लोग अपने बलबूते अपना गुजारा भी नहीं कर सकते और वे जीती जागती लाशें बनकर रह गए हैं। उसमें अब स्मार्ट सिटी का कार्यान्वयन, इससे बची-खुची ग्रामीण श्रमिक एवं बुद्धिजीवी वर्ग का पलायन बड़े पैमाने पर होना संभव है। जिसके चलते कृषक अपनी जमीन बेचने पर मजबूर होंगे और बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण होंगे और वही कृषक भविष्य में उस खेत के मजदूर होंगे।  
            शहरीकरण और आर्थिक जगत में सबसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। अनेक अप्रत्यक्ष प्रभावों के अतिरिक्त शहरीकरण का प्रभाव पूंजी के संचय, निवेश और औद्योगीकरण पर पड़ता है। जो गांव के शोषण पर निर्भर करता है। यह बात स्पष्ट है कि शहरीकरण और औद्योगीकरण में बहुत गहरा सम्बन्ध है। दोनों साथ-साथ चलते हैं और दोनों का सह सम्बन्ध घनात्मक है। प्रो. किग्सले डेविस तथा गोल्डन ने कार्ल पीपर्सन के सूत्र का प्रयोग करके शहरीकरण और औद्योगीकरन के बीच 0.86 का सह-सम्बन्ध स्थापित किया था। आर्थिक विचारों का इतिहास भी शहरीकरण और आर्थिक विकास के बीच घनिष्ठ सम्बन्धों को स्वीकार करता है। भारत में शहरीकरण पर हुई एक विचार गोष्ठी में किग्सले डेविस ने इस सम्बन्ध को और भी अधिक स्पष्ट रूप में व्यक्त किया। उनके अनुसार बिना औद्योगिकरण के शहरीकरण सम्भव नहीं है। संसार में कोई भी राष्ट्र ऐसा नहीं है जिसने आर्थिक विकास के साथ शहरीकरण का अनुभव न किया हो। उसमें अब स्मार्ट सिटी जिसमें औद्योगिकरण भी बड़े पैमाने पर होगा और बहुराष्ट्रिय कंपनियां एवं मॉल की बाढ़ होगी। छोटे-मंझोले और फुटपात के दुकानदार का पत्ता साफ हो जाएगा। 
            गांव और शहर के सवाल पर 1946 में संवाददाताओं द्वारा गांधीजी से पूंछे जाने पर की क्या आप नगरवासियों को फिर से गांव भेज देंगे? तो गांधीजी ने कहा था कि, नहीं वह तो नहीं करूँगा, मैं बस इतना ही चाहता हूँ कि शहरी अपने जीवन को इस तरह ढाले जिससे वह गांव वालों का शोषण बंद कर सके और ग्रामवासियों की बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में सहायता देकर जहां तक संभव हो उसकी क्षतिपूर्ति करें। गांधीजी का मानना था कि, यदि भारत को विनाश से बचाना है तो सीढ़ी के सबसे निचले भाग से शुरू करना होगा। यदि निचला भग सड़ा हुआ है तो ऊपर और बीच के हिस्सों पर किया गया काम अन्त में गिर पड़ेगा। यानि गांधी जी भारत की समृद्धि और विकास की बात गांवों से शुरू करने की बात करते हैं। रवीन्द्र नाथ टैगोर जी कहना था कि ‘भारत माता (गांव) को पद से गिराकर गांव के साधनों को शहरों में खींच कर नौकरानी बना दिया है।’ स्मार्ट सिटी में उत्पादित माल का उपयोग फिर ग्रामीण अधिक कीमत चुका कर करेंगे। ग्राम संस्कृति अभी दरिद्रता, निरक्षरता एवं पिछड़ापन का पर्याय है। समाज वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि नगरीकरण का रफ्तार रहा तो आने वाले समय में शायद भारत में गांव रहेंगे नही। इस तरह के शोषण ने गांधीजी को यह कहने पर मजबूर किया था कि ‘गांवों का खून शहरों की इमारत में लगा सीमेंट है। मैं चाहता हूं कि वह खून जो शहरों की अंतड़ियों में बह रहा है वह फिर गांवों के शरीर में वापस आ जाए।’ जबकि गांव हमारे देश और राज्य के विकास का मुख्य आधार है, क्योंकि पेड़ो की वृद्धि के लिए जड़ो का मजबूत होना जरूरी है।
            भारत की समृद्धि गांव के विकास से ही संभव है। भारत को विनाश से बचाने के लिए गांव को स्मार्ट बनाना जरूरी है, नहीं तो स्मार्ट सिटी काल के गाल के समान है।


संपर्क : संस्कृति विद्यापीठ, विकास एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,         वर्धा, महाराष्ट्र (442005), मो.- 9763710526, ई-मेल: chandankumarjrf@gmail.com