Tuesday, 29 July 2014

उग्र राष्‍ट्रवाद


       - चन्दन कुमार, जेआरएफ(यूजीसी)
पी -एच. डी. ,अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
 मो.-09763710526 ; ई मेल:chandankumarjrf@gmail.com  
                                                                          
“राष्ट्रवाद मानवता व विश्व के लिए एक अद्वितीय वरदान सिद्ध होगा,
यदि वह विशुद्ध देश प्रेम का पर्यायवाची हो सके।”[1] (हेज)
       राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद की भावना में देश प्रेम के तत्व निहित होते हैं जो देश के विविध मतावलंबी निवासियों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास करते हैं। सच्ची राष्ट्रीयता वही है जिसमें व्यक्ति देशहित व राष्ट्रहित के लिए सभी कुछ त्याग देने के लिए तत्पर रहता है।[2] सन 1961 में आयोजित राष्ट्रीय एकता सम्मेलन की रिपोर्ट में वर्णित राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता का स्वरूप इस तरह प्रदर्शित होता है “राष्ट्रीय एकता एक मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा लोगों के हृदयों में एकता, संगठन, सन्निकटता की भावना, सामान्य नागरिकता की भावना और राष्ट्र के प्रति भक्ति एवं भावना का विकास किया जाता है।”[3] कोठारी शिक्षा आयोग (1964-66) ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रवाद को इस प्रकार स्पष्ट किया है, “राष्ट्रीय एकता अपने में राष्ट्रीय भविष्य में विश्वास, उन्नत जीवन मूल्यों एवं कर्त्तव्यों की भावना, स्वच्छ प्रशासन का विश्वास और पारस्परिक सदभाव सम्मिलित किए हुए है।”[4] डॉ. हुमायूँ कबीर राष्ट्रीयता को अपने शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं कि “राष्ट्रीयता वह है जो राष्ट्र के प्रति अपनत्व की भावना पर आधारित होती है।”[5] स्तालिन ने राष्ट्रवाद कैसे पैदा होता है स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया है कि “बाजार पहली पाठशाला है जिसमें पूंजीपति वर्ग अपने राष्ट्रवाद की शिक्षा ग्रहण करता है।”[6] जब किसी राष्ट्र के नागरिक स्थान, वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन, भाषा साहित्य मूल्य मान्यताओं, जाति समूह और धर्म आदि के अंतर होते हुए भी सभी को एक समझते हैं और राष्ट्रहित के समक्ष अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक हितों का परित्याग करते हैं, यही भावना राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता कहलाती है।[7]       
भारतीय परिपेक्ष्य में ऐतिहासिक तथ्‍य है कि, राष्ट्रवाद का राष्ट्रीय आंदोलन के बिना जन्म नहीं होता। राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के बिना राष्ट्रवाद पैदा नहीं होता, राष्ट्रवाद की चेतना को पैदा करने में अंग्रेजों के भयावह शोषण और अत्याचारों, आम जनता की अकल्पनीय दरिद्रता के प्रभाव की केंद्रीय भूमिका से ही इसके गर्भ से राष्ट्रीय मुक्ति की ज्वाला पैदा हुई, राष्ट्रीय मुक्ति की चेतना ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है। राष्ट्रवादी चेतना का भी उसी गति से विकास होता है।[8] इस क्रम में नस्ली या धार्मिक घृणा भी पैदा होती है, जो उग्र राष्ट्रवाद को जन्म देती है।
राष्ट्र शब्द की उत्पत्ति में ही उग्र राष्ट्रवाद के तत्व निहित है। राष्ट्र शब्द लैटिन भाषा के शब्द नेसियों (natio) से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ एक ही स्थान पर जन्म लेना या एक ही प्रजाति में जन्म का होना। व्यापक अर्थ में राष्ट्र शब्द समान प्रजाति एवं किसी सामान्य स्थान पर जन्म लेने वाले लोगों से है। जिसका जाति एक, धर्म एक, ईश्वर एक, रीति-रिवाज एक, पर्व-त्योहार एक, भाषा एक, खान-पान एक, पहनावा एवं चालचलन का एक होना है। जो उग्र राष्ट्रवाद को बल प्रदान करता है।    
राष्ट्रवाद राजनीतिक तौर पर ऐसा फिनोमिना' है जिसमें धर्म, नस्ल आदि का बुनियादी आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। नस्ल के आधार पर राष्ट्रवाद की व्याख्याओं के बाद जर्मनी में फासीवाद का जन्म हुआ। भारत में धर्म को राष्ट्रवाद का आधार बनाने के कारण हिंदू राष्ट्रवाद, मुस्लिम राष्ट्रवाद और बाद में यह भारत विभाजन और पाकिस्तान की शक्ल में सामने आया।[9] जो राष्ट्रवाद का उग्र रूप ही है। देश की स्वतन्त्रता के साथ ही समग्र-राष्ट्रियता चेतना दो हिस्सों में बंट गयी। राजनैतिक और आर्थिक राष्ट्रीयता या तो नौकरशाही के प्लानों और प्रोजैक्टों में फंसी रही और सामाजिक कल्याण के करोड़ों के बजट कभी उन लोगों तक पहुच ही नहीं पाये, जिनके नाम पर वे चलाये गए थे या फिर सूखती और विकृत होती स्वयंसेवी संस्थाओं के खाऊ हाथों में। अंग्रेज़ चले गए, मगर नौकरशाही वहीं रही-वैसी ही हृदयहीन और लूट-खसोट वाली। राजा समाप्त हो गए-मगर सामंतवादी मूल्य और व्यवस्था वही रही और वैसी ही बनी रही दोनों के बीच की सांठ-गांठ। कुर्सी और नौकरी बचाऊ सरकार को चूंकि जनता के लिए कुछ भी नहीं करना था, इसलिए आज सरकारी राष्ट्रीयता और समाज की राष्ट्रीयता दोनों एक दूसरे के खिलाफ खड़ी हुई हैं। सरकार के लिए राष्ट्रीयता का अर्थ है उत्सवधार्मिता, मूर्तियों का पूजन, भौगोलिक वंदना और देश की सीमा सुरक्षा-इसके अलावा राष्ट्रीयता की हर परिभाषा राष्ट्रद्रोह है।[10]    
पूंजीवाद में अनिवार्यत: अर्थसत्ता का केन्द्रीकरण और राजसत्ता का केन्द्रीकरण साथ-साथ चलते हैं। ऐसी स्थिति में एक ओर शासक जातियाँ शासितों के दमन और उत्पीड़न से अपने को लाभान्वित करना चाहती हैं क्योंकि शासितों की अपनी परंपरा और जीवन शैली को अपने अनुकूल ढाल कर ही वे उन्हें अपने पूंजीवादी-साम्राज्यवादी हितों के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं, तो दूसरी ओर शासित जातियाँ अपने को राजनीतिक दमन और आर्थिक शोषण से बचाने के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान को एकता का आधार बनाती हैं, जिससे साम्राज्यों के विरुद्ध नेशन-स्टेट्स के संघर्ष का जन्म होता है। स्पष्ट है कि पश्चिमी अर्थों में जिसे राष्ट्र, राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद कहा जाता है, वह विभिन्न जातियों के साम्राज्यवादी या पूंजीवादी सम्बन्धों का एक परिणाम है क्योंकि पूंजीवाद या साम्राज्यवाद अनिवार्यतया केन्द्रीकरण उस सत्ता से दमित और शोषित जनसमूहों को संघर्ष करने को मजबूर कर देता है।[11] ब्रिउली ने राष्ट्रवाद के सवाल को राजनीति और राज्य के व्यापक संदर्भ में रखकर देखा है, “राष्ट्रवाद, कुल मिलाकर सबसे पहले राजनीति का सवाल है और उस राजनीति का मतलब सत्ता से है। आधुनिक संसार में सत्ता का बुनियादी संबंध राज्य के नियंत्रण से है।”[12]
राज्य में सत्ता का केन्द्रीकरण, राष्ट्रीय बोध में दरार का एक महत्वपूर्ण कारण है, जिसकी वजह से राजसत्ता स्थानीय और गैर-राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार पा जाती है और तब राजसत्ता पर पूर्णतया और निष्कंटक काबिज न हो पाने वाली जाति या समूह अपने को अरक्षित और दमित-शोषित मानने लग जाती है, जो प्रकारांतर से उसमें एक प्रतिक्रियात्मक राष्ट्रवाद-आत्मनिर्णय के आधार पर विकसित नेशन-स्टेट वाले राष्ट्रवाद का विकास करती है और जाहिर है कि उसका आधार एक प्रकार का उग्र भाषावाद, संप्रदायवाद या क्षेत्रीयतावाद हि हो सकता है। संसदीय सर्वोच्चता का सिद्धान्त अंततोगत्वा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सर्वसत्तावाद की स्थापना की कोशिश हो जाता है और एक बहुलवादी समाज में इस तरह का सर्वसत्तावाद एक केंद्र को सर्वशक्तिमान और अन्यों को उसके सम्मुख हीनता का बोध करवाकर उन्हें अपनी श्रेष्ठता के संघर्ष के लिए मजबूर करता है।[13] 
उग्र राष्ट्रवाद का भूत जिस देश पर सवार हो जाता है वह मानवता का विनाश करने में अपना पूर्ण बल लगा देता है। राष्ट्र-राज्य के युग में राष्ट्रवाद हवा की तरह हो गया है, जिसमें हम अचेतनमन से सांस लेते जाते हैं जब तक वह पूरी तरह प्रदूषित न हो। भाजपा ने जिसे ठीक ही तीन हिन्दू, हाइकास्ट (उच्च जाति) और हिन्दी की पार्टी कहा जाता था, इन समूह विशेष की पहचानों से बाहर निकलने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर हिन्दुत्व की पहचान बनाई है। कांग्रेस जिसने उपनिवेश विरोधी संघर्ष के दिनों से ही धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की विचारधारा को विरासत में प्राप्त किया था, राष्ट्रवाद की अपनी रूपरेखा को मुक़ाबले में पेश कर सकती थी। परंतु उसने अपनी विश्वसनीयता गवानी शुरू कर दी क्योंकि उसने संकट के समय समुचित कदम नहीं उठाए और धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर दोटूक कदम न उठाना उसे राजनीतिक तौर पर अधिक सुविधाजनक लगा। उदाहरण के लिए उसने सिख विरोधी दंगों (1984) और बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992) के समय ऐसा ही किया।[14]
किसी भी राष्ट्र में कुछ व्यक्ति संकीर्ण भावनाओं से प्रेरित होकर राष्ट्रवाद के विरुद्ध कार्य करते हैं इससे यह अभिशाप और दोष के रूप में पहचाना जाता है। वर्त्तमान युग में आतंकवाद, उग्रवाद, राष्ट्रवाद के विरुद्ध संचालित हो रहा है।[15] इस तरह उग्र राष्ट्रवाद आतंकवाद, उग्रवाद, सैनिक वाद को बढ़ावा देता है। उग्र राष्ट्रवाद सेनाओं की सैन्य शक्ति का प्रयोग करते हुए जनता की भावनाओं को कुचलने का काम करती है। जन-आंदोलन के दौरान उठाई गई आवाज को कुचलने का काम करती है। इसके माध्यम से नागरिकों के ऊपर अत्याचार, दमन किया जाता है।  
उग्र राष्ट्रवाद विश्व शांति का विरोधी है, राष्ट्रवाद जब उग्र रूप धारण कर लेता है तब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले प्रयास असफल हो जाते हैं। एक क्रान्ति दूसरी क्रान्ति को जन्म देती है एक राष्ट्र का आतंकवाद दूसरे राष्ट्र की शांति भंग करता है। इस तरह विश्व संगठनों के कार्यों में बाधा उत्पन्न होता है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर मानवीय अत्याचार करके शोषण भी करता है। अत: उग्र राष्ट्रवाद विश्व शांति में बाधा भी उत्पन्न करता है।[16]
उग्र राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद को बढ़ावा देता है, उग्र राष्ट्रवाद की लालसा साम्राज्यों की स्थापना करने में बदल जाती है। राष्ट्रवाद का फैलाव एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक करने के साथ-साथ उस राष्ट्रवाद की नीति साम्राज्यवादी सिद्धांतों का अनुसरण करने में लग जाती है इससे अनेक प्रकार की रक्षा के नाम पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली ने युद्धों का संचालन भी किया है। दूसरी तरफ यह इन राष्ट्रों का राष्ट्रवाद भी रहा है।[17]
आर्नोल्ड टायनबी का कहना है कि “राष्ट्रवाद शांति एवं समृद्धि के मार्ग में एक बड़ी बाधा के रूप में खड़ा है। इसलिए आणविक शास्त्रों के समान राष्ट्रवाद मानवता का प्रमुख शत्रु है।”[18] वर्त्तमान परिस्थिति में भारत में राष्ट्रवाद या देशभक्ति जैसे शब्द सारतत्वहीन नारे भर है।    





[1] नारायण, इकबाल; आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, ग्रंथ विकास जयपुर, 2005, पृ. 316
[2] शर्मा, के. के.; भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं चिंतन, रिसर्च पब्लिकेशन्स, जयपुर, पृ. 2  
[3] वही; पृ. 1
[4] वही; पृ. 1-2
[5] वही; पृ. 2
[6] सिंह, अयोध्या; भारत का मुक्ति संग्राम, ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली, तीसरा, 2003, पृ. 15
[7] शर्मा, के. के.; पूर्वोक्त, पृ. 1   
[8] चतुर्वेदी, जगदीश्वर; ‘सांप्रदायिकता, आतंकवाद और जनमाध्यम, पृ. 9
[9] वही; पृ. 18
[10] यादव,राजेन्द्र; अनपढ़ बनाये रखने की साजिश (कांटे की बात-2), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय, 2007, पृ. 27-28
[11] आचार्य, नंदकिशोर; सत्याग्रह की संस्कृति, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, 2008, पृ. 35
[12] अनिवेद, शिव नारायण सिंह; आधुनिक भारत की द्वंद्व-कथा, पृ. 77-78
[13] आचार्य, नंदकिशोर; पूर्वोक्त, पृ. 39   
[14] भादुडी, अमित; प्रतिष्ठापूर्ण विकास, अनु॰, डॉ. गिरीश मिश्र, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, 2006, पृ. 29
[15] कोली, सी. एम.; आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ,  पृ. 151
[16] वही; पृ. 152
[17]  वही;
[18] भाटिया, पी. आर.; अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं विश्व राजनीति, यूनिवर्सल बुक डिपो, आगरा, 1978, पृ. 56  

भारत में सर्वसत्तावाद


                                                                                                                         - चन्दन कुमार, जेआरएफ(यूजीसी)
पी -एच. डी. ,अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
मो.-09763710526 ; ई मेल:chandankumarjrf@gmail.com 
            आज भारत में जैसी राज्य-व्यवस्था चल रही है वह राज्य-तंत्र की पद्धति से ही चल रही है, कुल मिलाकर जनता अंततोगत्वा सर्वसत्तावादी राज्यवाद यानी तानाशाही की शिकार है। कल्याणकारी राज्यवाद के इस नए स्वरूप ने समाज में स्वतंत्र रूप से नागरिकों के अभिक्रम में होने वाले क्रिया कलापों को समाप्त प्राय कर दिया है। छोटे-से-छोटे सामाजिक काम के लिए भी राज्य की स्वीकृति अनिवार्य हो गयी है। परिणाम यह हो गया है कि जिस राज्यवाद के चुंगल से निकलने के लिए लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना की गयी थी, इस व्यवस्था ने मनुष्य की स्वतन्त्रता, समानता और भाईचारे की आकांक्षा को ही धूल में मिला दिया है। इस नयी व्यवस्था के नौकरशाही तंत्र ने जन-जीवन पर राज्य की पकड़ और भी मजबूत बना दी है।[1] लोकसेवा और व्यवस्था के सभी काम राज्यतंत्र के अंतर्गत आने से राज्य संस्था अधिक विस्तृत और शक्तिशाली बनी जिसके कारण उसे जनता पर अपनी सत्ता को अधिक व्यापक और मजबूती से प्रतिष्ठित करने का अवसर मिल[2] गया। इस तरह क्रमश: अपना कलेवर बढ़ाते हुए राज्य संस्था सम्पूर्ण कल्याणकारी तथा समाधानकारी बनने के बहाने सर्वाधिकारी बन बैठा। हर एक देश का अपना शासक वर्ग होता है, किन्तु हिंदुस्तान का शासक वर्ग इतना निश्चल और सत्ता की जगहों पर इतनी मजबूती से जमा हुआ है कि उतना किसी और देश में अथवा युग में कभी नहीं हुआ।[3] यहाँ “नेतागिरी वाली खान सिकुड़कर कुछ खास जातियों और खास परिवारों तक ही सीमित रह गयी है।”[4] जून 1975 में आंतरिक आपातकाल की घोषणा के बाद 19 महीने तक भारत के लोकतन्त्र की जो दशा रही, उसकी आलोचना यही कहकर की जाती है कि उस समय राज्य की सत्ता सम्पूर्ण जनता अथवा उसके किन्हीं प्रतिनिधियों में निहित न रहकर कुछ व्यक्तियों या केवल एक व्यक्ति, (तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इन्दिरा गांधी) में निहित हो गई थी तथा व्यक्ति के मूल अधिकार व स्वतंत्रताओं पर राज्य का सर्वाधिकार हो गया था।[5] राम मनोहर लोहिया मानते है कि हिंदुस्तान का शासकवर्ग तीन लक्षणों में पारंगत है: ऊँची जाति, अंग्रेजी शिक्षा और संपत्ति। इनमें से कोई दो लक्षण साथ जुड़ जाने पर कोई भी व्यक्ति शासकवर्ग का बन जायेगा। “देश के सभी राजनीतिक दलों का नेतृत्व शासक जातियाँ करती हैं। चाहे जितना वे एक-दूसरे से बैर रखते हों और सामंजस्य न होने वाले कितने ही विपरीत सिद्धांतों की बातें वे भले ही करते हों, पर जनता के विरुद्ध वे सब एक ठोस व्यूह के रूप में आते हैं और विशिष्टता में भाई-चारे के सैकड़ों बंधनों से बंधे हुए है।”[6] “हिंदुस्तान का शासक वर्ग चाहता है कि हिंदुस्तान का दिमाग बंटा रहे। राष्ट्रीय दिमाग न बनने पाये, ताकि लोग असली सवालों पर सोचें ही नहीं।”[7] “सच बोलना आज राजनीति में प्राय:खत्म हो रहा है। यह विलासिता का युग है और यह विलासिता भी कुछ ही लोगों और कुनबों तक सीमित है।”[8] “इस देश में हजारों वर्षों से कुछ खास जातियों और खास परिवार चले आ रहे हैं जो लगातार हिंदुस्तान की पढ़ाई-लिखाई, व्यापार और अफसरी पर अपना सिक्का जमाए हुए हैं।”[9] इस देश में कहने को भले ही जनतंत्र हो, लेकिन परिस्थिति ऐसी बन गयी है या बना दी गयी है कि शासन का सारा तंत्र, विकास की योजनाएँ, सरकारी विभाग, सार्वजनिक सेवाएँ, पुलिस आदि- शासन के ये सारे उपकरण और व्यवस्थाएँ- आम जनता के कल्याण में सहायक न होकर उल्टे उसके विकास, उन्नति और आगे बढ़ने के मार्ग की बाधाएँ बन गयी हैं। इतना ही नहीं, ये जनता की लूट, उसके शोषण और दमन के हथियार तथा उस पर आतंक जमाने के साधन बन गए हैं।[10] सत्ताधारियों ने जन-हित की व्यवस्थाओं, नीति-नियमों और विकास-योजनाओं को अपने स्वार्थ साधन का जरिया बना लिया है।[11] बल्कि आततायियों की क्रीड़ास्थली बना ली है। वे सभी तरह के अधिकारों को अपने में समाहित कर लेता है।
            राजेन्द्र यादव ने अपनी पुस्तक अनपढ़ बनाए रखने की साजिश में लिखते हैं कि, “अपराध, राजनीति, नौकरशाही और न्याय-प्रणाली सब आपस में जिस तरह घुल-मिल गए है, उसमें कोई चमत्कारी मसीहा ऐसा नहीं है जो इन्हें छांटकर अलग- अलग कर दे। लोकतन्त्र का सीधा अर्थ है सबको समान अवसर, न्याय और उद्यम की स्वतन्त्रता- सबके प्रतिनिधियों की चुनाव श्रिंखला में अंतिम रूप से एक का चुना जाना-मगर आज तो ये सारे चुनाव वही जीतेंगे जिनके पास साधन होगें, शक्ति होगी, पैसा  होगा। यानि चुनाव आज आदर्श, मूल्य और स्वप्न नहीं जीतेंगे, जीतेंगे सिर्फ साधन- सम्पन्न, धर्मांध, हत्यारे, डाकू और स्मगलर या इनकी मदद लेकर आए हुए प्रतिनिधि, बदले में इन्हें खुली छूट और सुरक्षा के आश्वासन दे सकने वाले कठपुतले।[12] हिंदुस्तान में विशिष्ट सज्जन बहुत कम हैं और राजनीति में दाखिल लोगों शिष्ट और अशिष्ट दोनों है। आज की राजनीति में दो कमियाँ है। राजनीति में केवल भले-भले लोग ही दाखिल होते हैं, एसी बात नहीं। गलत लोग, सत्ता के अभिलाषी भी दाखिल[13] हो गए है। विनोबा जी का मानना है कि “आज लोगों का सत्ता पर अंधा विश्वास बैठ गया है। बुद्ध भगवान के हाथ में सत्ता थी, फिर भी वे सत्ता छोडकर निकाल पड़े। सत्ता से अगर सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक या आध्यात्मिक क्रांति हो सकती तो जिनके हाथ में सत्ता थी, क्या वे उसे छोड़कर इस तरह निकल जाते? लेकिन बुद्ध भगवान जान गए थे कि सत्ता से समाज का परिवर्तन नहीं हो सकता।”[14] विनोबा जी शासन-मुक्ति की बात इसलिए करते हैं कि “शासन देखते-देखते दु:शासन हो जाता है। लोकतन्त्र का आधार यदि लश्कर हो तो उसका रूपान्तर लश्करशाही  में होने में कितनी देर लगेगी? ऐसी अवस्था में यदि हम शासन पर ही निर्भर रहेंगे तो शासन का रूपान्तर एक क्षण में दु:शासन में, कुशासन में हो सकता है।”[15] भारत के लोकतन्त्र की हालत बादशाह जैसी है। लोकशाही के नाम पर शाही सत्ता थोड़े-से लोगों के हाथों में सौंप देते हैं। अब लोकशाही ही सरमुखत्यारशाही बन गयी तो फिर सरमुखत्यारशाही का क्या होगा, इसकी तो कल्पना ही की जा सकती है। वे अपनी सत्ता जुल्म के ज़ोर पर चलाते हैं और ये लोग मत-पेटी द्वारा चलाते हैं। सत्ता को या तो पैसे से खरीदते हैं या वैज्ञानिकों के मार्फत खरीदते हैं।[16]
            देश में स्वराज्य आया लेकिन यह स्वराज्य जनता का यानि गांव वालों का स्वराज्य न होकर नेताओं और प्रतिनिधियों का राज्य हुआ। देश में पाँच लाख गांवों की योजना दिल्ली में बनेगी। जीवन के समस्त विषयों पर दिल्ली निर्णय लेगी। समाज में कैसे सुधार हो, विवाह किस तरह हों, छूत-अछूत का भेद कैसे मिटे, कैसी चिकित्सा-पद्धति लागू की जाय, भारत में किस भाषा का प्रचलन हो, सिनेमा किस ढंग से चले आदि जीवन के सभी विषयों में दिल्ली में योजना तय होगी। अगर इतनी अधिक सत्ता केन्द्र को सौंपते हैं, तो सारा जनसमुदाय पराधीन हो जाता है।[17]
            दुनिया में इस समय एक बड़ा मोह काम कर रहा है और वह है सत्ता-मोह। सज्जन लोग भी यह मान बैठे हैं कि सत्ता के बिना वे काम नहीं कर सकते अथवा सत्ता की मदद से वे अधिक काम कर सकेंगे।[18] आजकल तो मानो सत्ता को देवी ही मान बैठे हैं। इसके लिए होड़ चलती है। इसमें से प्रतिपक्ष, उपपक्ष फूट निकलते हैं और फिर भी आसक्ति जाती नहीं। ओहदों पर चिपके रहने की वृत्ति पैदा होती है। यह सब आश्चर्यजनक नहीं, दुखदाई है।[19] क्योंकि एक बार सत्ता हाथ में आने के बाद फिर उसे अपने हाथ में बनाए रखने के प्रयत्नों में ही सारी शक्ति खर्च हो जाती है।[20]
            सत्ता हाथ में लेकर लोक-कल्याण की प्रक्रिया प्राय: असफल ही हो चूकी है। अतएव सामाजिक कार्य सत्ता के मार्फत ही हो सकते हैं, यह समझना निरा भ्रम है। सत्ता द्वारा कभी समाज नहीं बन सकता। विचार समझकर ही जो आचरण होता है, उसी में समाज की शक्ति बनती है। आज दुनिया में शांति नहीं है, क्योंकि सर्वत्र सत्ता चलती है। केवल राज्यक्षेत्र में ही नहीं, बल्कि घर में, स्कूल में और मंदिरों में भी सत्ता ही सर्वोपरि हो गयी है।[21]
            आज मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सत्ता पहुँच गयी है।[22] सत्ता सेवा का छेद करती है।[23] आज तो केन्द्र में और प्रांत में हिंदुस्तान के हरेक गाँव के सब व्यवहारों को नियंत्रित करने की सत्ता है। गाँव वालों को कोई भी निर्णय करने का हक नहीं। गाँव में बाहर के डॉक्टर आयें या न आयें, इसे तय करने का हक भी गाँव वालों को नहीं है। गाँव के सारे धंधे टूट गए हैं, उन्हें फिर से शुरू करना है या नहीं, इस बारे में निर्णय करने की सत्ता भी केन्द्र में है, गाँव में नहीं। परिणामत: सारा स्वराज केन्द्र में होता है, गाँव में नहीं।[24]              
            चुनाव पद्धति में जिसके पास ज्यादा पैसा है, वही इसमें भाग ले सकता है, जिसके हाथ में ज्यादा सम्पत्ति है, वही चुनाव में खड़ा होता है।[25]
            आज तो सत्ता या तो शस्त्रवान के पास है या शास्त्रवान के पास या धनवान के पास। आम जनता के पास सत्ता नहीं है, क्योंकि उसके पास न शस्त्र है, न शास्त्र और न धन।[26] कुरूप अलंकरणों की बर्बरता से सज्जित व्यवसायीकरण सारी मानवता के लिए बहुत बड़ा जोखिम है क्योंकि यह पूर्णता के स्थान पर सत्ता के आदर्श को अधिक महत्व देता है। यह स्वार्थपरायणता के पंथ को बेशर्मी से बढ़ावा दे रहा है।[27] इस तंत्र में सत्ता का संबंध जनबल और बाहुबल से है। सत्ता प्रभुत्व-वर्चस्व स्थापित करने का साधन [28]मात्र है।
            सर्वसत्तावादी व्यवस्था में नियंत्रण अधिकारियों के हाथ में इतना ज्यादा आ जाता है कि उससे सामान्य नागरिकों कि स्वतन्त्रता संकट में पड़ जाती है। इस व्यवस्था में नौकरतंत्र या सेवकतंत्र अग्नि के समान हो जाते है जो एक सेवक के तौर पर तो उपयोगी सिद्ध होता है, लेकिन जब वह मालिक प्रणाली अथवा स्वामी बन जाता है तो व्यक्ति के लिए घातक सिद्ध होता है। ऐसी नौकरशाही व्यवस्था या सर्वसत्तावाद में मंत्रीय उत्तरदायित्व के लबादे में बढ़ती या पनपती है। सर्वसत्तावाद में आत्माभिमान कि अधिकता रहती है। व्यक्तिगत नागरिकों के प्रति उदासीन रहते हुए विभागीय निर्णयों के संबंध में कठोर नीति का पालन करता है। शासक अपनी सुविधा के अनुसार कानून बनाकर समाज पर थोप देता है। सर्वसत्तावाद में कर्मचारियों में अहं की भावना का विकास होता है। वे स्वयं को उच्च एवं समाज से अलग-थलग समझने लगते हैं। सामान्य जनता से मिलने, उनका काम करने तथा उसकी कठिनाई सुनने में आत्महीनता महसूस करते है। अपने आपको सर्वगुण सम्पन्न समझने की वजह से नीतियों का निर्धारण सही से नहीं कर पाते है। शासन तथा रौब दिखाना अपना नैतिक कर्त्तव्य समझने लगते है। सर्वसत्तावाद में नौकरशाही तानाशाह का रूप अख्तियार कर लेता है। ये हमेशा इस प्रकार के साधनों की खोज में रहते हैं जिससे जनता को ज्यादा-से-ज्यादा दबाया या लूटा जा सके।
            वस्तुत: राज्यवाद और पूंजीवाद के विशाल सर्वाधिकारी तथा सर्वग्रासी स्वरूप के कारण भारत की जनता पर एक भंयकर नए संकट का निर्माण हुआ है, वह है नौकरशाहों की एक विराट फौज। राज्यवाद का विस्तार जैसे हुआ है वैसे ही फैलती हुई संस्था के संचालन की नित्य नयी आवश्यकता के कारण नये-नये विभाग और उनके चालकों की संख्या बढ़ती गयी। जिससे नौकरशाहों की एक विशाल जमात खड़ी हो गयी, फलस्वरूप एक अत्यन्त मजबूत और अभेद्य नौकरशाह वर्ग की सृष्टि हुई। जिसका नतीजा यह हुआ कि सेवा अब धर्म न रहकर पेशा एवं लूट-खसोट का अड्डा बन गया। फलस्वरूप आम जनता सर्वसत्तावादी व्यवस्था में नौकरशाहों के शोषण और दमन से पीसा जा रहा है।      





[1] लोकक्रांति पाथेय धीरेन्द्र मजूमदार स्मृति ग्रंथ, धीरेन्द्र मजूमदार का मौलिक चिंतन, सं॰, नरेंद्र भाई एवं अन्य, पृ. 31
[2] वही;
[3] लोहिया, राम मनोहर; भारत के शासक, सं॰, ओंकार शरद, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, तृतीय संस्कारण, 2007, पृ. 17   
[4] वही; पृ. 109
[5] नारायण, इकबाल; आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, ग्रंथ विकास जयपुर, 2005, पृ. 309-10
[6] लोहिया, राम मनोहर; पूर्वोक्त, पृ. 19
[7] वही; पृ. 105
[8] लोहिया, राम मनोहर; पूर्वोक्त, पृ. 80   
[9] वही; पृ. 107
[10] बंग, ठाकुरदास; असली स्वराज्य, सर्वसेवासंघ, वाराणसी, फरवरी, 1995, पृ. 24
[11] वही;  
[12] यादव,राजेन्द्र; अनपढ़ बनाये रखने की साजिश (कांटे की बात-2), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय, 2007, पृ. 10
[13] विनोबा; लोकनीति, पृ. 67
[14] वही; पृ. 22-23
[15] वही;  पृ. 22
[16] वही; पृ. 46
[17] वही; पृ. 47
[18] वही; पृ. 79
[19] वही;
[20] लोकक्रांति पाथेय धीरेन्द्र मजूमदार स्मृति ग्रंथ, धीरेन्द्र मजूमदार का मौलिक चिंतन, सं॰, नरेंद्र भाई एवं अन्य, पृ. 32
[21] विनोबा, लोकनीति, पृ. 89
[22] वही; पृ. 87
[23] वही; पृ. 95
[24] वही; पृ. 52  
[25] वही; पृ. 39
[26] वही;
[27] टैगोर, रवीन्द्रनाथ; राष्ट्रवाद, अनु॰, सौमित्र मोहन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नई दिल्ली, 2003, पृ. 64-65 
[28] युवा संवाद, सं., ए के. अरुण, जून 2013, अंक-123, पृ. 30 

सर्वसत्तावाद


                                                                                                                 - चन्दन कुमार, जेआरएफ(यूजीसी)    
पी -एच. डी. ,अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
मो.-09763710526 ; ई मेल:chandankumarjrf@gmail.com 

“तुम्हें सोचने की आवश्यकता नहीं, वह तुम्हारे लिए सोचेगा।
तुम्हें देखने की आवश्यकता नहीं, वह तुम्हारे लिए देखेगा।
तुम्हें बोलने की आवश्यकता नहीं, वह तुम्हारे लिए बोलेगा।
तुम्हें कुछ करने की आवश्यकता नहीं, वह तुम्हारे लिए करेगा।”[1] (फ्रेरे)
            सत्ता को राजनीतिक व्यवस्था की मूल आत्मा माना जाता है। सत्ता राजनीतिज्ञ एवं नौकरशाही को निश्चित समय पर निश्चित कार्यों को सम्पन्न कराने के लिए अधिकार व शक्तियाँ प्रदान करती है। वायर्सटेड के अनुसार भी “सत्ता शक्ति के प्रयोग का संस्थागत अधिकार है। सत्ता स्वंय शक्ति नहीं है, वरन सत्ता के साथ निश्चित अधिकार भी जुड़े रहते हैं। इन अधिकारों को सम्पूर्ण करने का नाम ही सत्ता है।”[2] बीच के अनुसार, “सत्ता उसे कहते हैं जिसके माध्यम से  दूसरे के कार्य निष्पादन, प्रभावित या निर्देशित करने के साथ-साथ कार्य-सम्पन्न की दृष्टि से उसे औचित्यपूर्ण अधिकार दिये गए हों।”[3] अतएव सत्ता उस नेतृत्व का नाम है जिसके माध्यम से शासन व्यवस्था के समस्त कार्य सम्पन्न किए जाते हैं एवं सत्ता की व्यवस्था समाज को सुचारु रूप से चलाने में सहायक होती है। परंतु जब यह व्यवस्था आवश्यकता से अधिक कठोर हो जाती है, तब वह सामाजिक प्रगति में बाधक बन जाती है। जब सत्ता का प्रयोग करने वाले केवल आज्ञा या उत्पीड़न से मतलब रखते हैं, और दूसरे पक्ष की भावनाओं को जानने का प्रयत्न नहीं करते तब सत्ता उत्पीड़नकारी रूप धारण कर लेती है। जिससे सर्वसत्तावाद का जन्म होता है और इसका नेतृत्व केंद्रीय स्तर से संचालित होने लगता है।
             सर्वसत्तावाद या सर्वाधिकारवाद (Totalitarianism) एक ऐसा शब्द है जो निरंकुशता, अधिनायकवाद, और तानाशाही जैसे पदों का समानार्थक है। सर्वसत्तावाद में सत्ता प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए प्रजातन्त्र के नाम पर व्यक्ति-व्यक्ति को, जाति-जाति को, संप्रदाय-संप्रदाय को तोड़ा जाता है तथा उनके बीच वैमनस्य के बीज बोये जाते है। जिसमें सत्ता पर आसीन व्यक्ति अपनी सत्ता की कोई सीमारेखा नहीं मानता और लोगों के जीवन के सभी पहलुओं को यथासम्भव नियंत्रित करने को तत्पर रहता है। ऐसा शासन प्रायः किसी एक व्यक्ति, एक वर्ग या एक समूह के नियंत्रण में रहता है। सत्ता दमनकारी हो जाती है तथा सत्ता के समक्ष आज्ञापालन अधिकाधिक कराया जाता है। इस तरह सर्वसत्तावाद मनमानेपन का संकेत है। सेबाइन के अनुसार “सर्वाधिकारवादी राज्य में मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन एवं कार्यकलाप पर राज्य का अधिकार होता है और व्यक्ति का अपना कहे जाने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता है।”[4] सर्वसत्तावाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता, उसके व्यक्तिगत हित तथा उसके महत्व पर बल देने वाली विचारधाराओं के विरुद्ध एक ऐसी प्रतिक्रिया है जो व्यक्ति एवं उसके व्यक्तित्व को गौण तथा राज्य एवं उसकी सत्ता को मुख्य मानते हुए व्यक्ति के संपूर्ण जीवन पर राज्य के पूर्णाधिकार का समर्थन करती है।
            राज्य को व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन पर सर्वाधिकार प्राप्त हो जाय, उसे सर्वाधिकारवादी व्यवस्था कहा जाता है। इस व्यवस्था में राज्य मनुष्य पर जन्म से लेकर कब्र तक शासन करने लगती है। इस तरह सभी कुछ राज्य के अंतर्गत हो जाता है, राज्य के विरुद्ध या राज्य के बाहर कुछ भी नहीं रहता है। व्यक्ति पूर्णत: राज्य के अधीन एवं उसके हाथों का खिलौना या दास बन जाता है। प्रेस, रेडियो, चलचित्र तथा साहित्य एवं कला सभी पर राज्य का कठोर नियंत्रण स्थापित हो जाता है, व्यक्ति की स्वतन्त्रता एक स्वप्न जैसी हो जाती है। जैसा कि डॉक्टर नोबिल्स ने कहा है “ऐसे राज्य में प्रेस एक पियानो बना दी जाती है, जिस पर प्रचार मंत्रालय अपनी धुनें बजाता है।”[5] इस तरह सर्वाधिकारवाद सार्वजनिक जीवन में धोखाधड़ी, परस्पर विद्वेषपूर्ण व्यवहार, तथा घृणा जैसी बातों के प्रयोग को प्रोत्साहित करती है। दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य को पशु बनाने के लिए तत्पर रहती है। लोकतन्त्र पर सर्वाधिकारवाद का विजय पशुता की मानवता पर विजय है।  
            प्लेटो राज्य को एक अवयवी संस्था मानते हुए यह प्रतिपादित किया है कि राज्य के बिना व्यक्ति का कोई अस्तित्व व व्यक्तित्व नहीं हो सकता है। व्यक्ति के विरुद्ध राज्य के अधिकार के प्रतिपादन में प्लेटो इतना अधिक आगे बढ़ गए कि अपने साम्यवाद संबंधी दृष्टिकोण के प्रतिपादन में राज्य को यह अधिकार प्रदान करते हैं कि वह चाहे अपने जिन नागरिकों को संपत्ति का अधिकार दे अथवा नहीं दें। यही नहीं प्लेटो के अनुसार राज्य का यह भी अधिकार है कि वह अपने कुछ नागरिकों को पारिवारिक जीवन व्यतीत करने के अधिकार से भी वंचित कर दे। इस प्रकार व्यक्ति एवं राज्य के संबंध में प्लेटो कि विचारधारा व्यक्ति के ऊपर राज्य को सर्वाधिकार प्रदान करती है। प्लेटो के शिष्य अरस्तू ने भी राज्य को सर्वाधिकार प्रदान किए हैं जैसा कि अरस्तू ने कहा है कि “राज्य का स्थान परिवार एवं व्यक्ति से स्पष्टत: पहले है, चूँकि पूर्ण का स्थान अंश से पहले होता है।”[6] थामस हॉब्स ने बिना राज्य सत्ता के व्यक्ति का जीवन एकांकी, दीन, घृणित, पाशविक एवं क्षणिक” माना है तथा इस स्थिति के निराकरण के लिए उसने राज्य के ऐसे महामानव रूप का प्रतिपादन किया है, जिसके पक्ष में व्यक्तियों द्वारा अपने सब अधिकारों का समर्पण किए जाने के कारण उसके विरुद्ध व्यक्ति के कोई अधिकार नहीं रहते हैं।[7] आदर्शवादी विचारक हिगल ने राज्य को साध्य तथा व्यक्ति को उसका साधन माना है। हिगल के शब्दों में “व्यक्ति का सारा मूल्य और महत्व तथा उसकी सम्पूर्ण आध्यात्मिक सत्ता केवल राज्य में ही संभव है।” एवं “राज्य निरंकुश, सर्वशक्तिमान और अभ्रांत है। वह पृथ्वी पर परमेश्वर का अवतार है। वह पृथ्वी पर अस्तित्वमान एवं दैवीय विचार है।” हीगल के मतानुसार राज्य व्यक्ति के बाह्य आचरण का ही नियामक नहीं, वरन वह उसके नैतिक आचरण का भी नियामक है। हीगल के मत में राज्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का नियमन अपनी विधियों के माध्यम से करता है। हीगल इस प्रकार व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को राज्य के नियमन के अधीन बना कर राज्य को व्यक्ति के ऊपर सर्वाधिकार प्रदान करता है।[8]
            मार्क्सवाद द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक समाजवाद में, जिस सर्वहारा अधिनायकतंत्र की स्थापना की बात कही गयी है, उस राज्य की स्थिति भी सर्वाधिकारवादी ही है, क्योंकि उसमें भी राज्य सत्ता के प्रयोग द्वारा बलपूर्वक व्यक्तिगत संपत्ति की समाप्ति एवं उत्तराधिकार की समाप्ति, उत्पादन व वितरण की सम्पूर्ण आर्थिक व्यवस्था पर राज्य का अधिकार, राजकीय नियोजन के माध्यम से आर्थिक व्यवस्था का संचालन, प्रत्येक काम करने योग्य व्यक्ति के लिए काम, की अनिवार्यता, तथा भगोड़े व विद्रोहियों की संपत्ति की जब्ती आदि सबको व्यक्ति के विरुद्ध राज्य के निरंकुश सर्वाधिकार के अन्तर्गत माना गया है। रूस, चीन और पूर्वी यूरोप के देशों में जिस साम्यवादी रूप में इसे अपनाया गया, उसमें साम्यवादी दल की सर्वोच्च सत्ता एवं लोकतान्त्रिक केन्द्रीयकरण के नाम से शीर्ष पर शासन की शक्ति के एकत्रीकरण के कारण व्यक्ति की अधीनता और अधिक हेय एवं राज्य का सर्वाधिकार और अधिक कठोर हो जाता है। साम्यवादी व्यवस्था को सर्वाधिकारवाद का पर्याय ही माना जाने लगा।[9]
             फासीवाद एवं नाजीवाद के मुख्य प्रतिपादकों में क्रमश: मुसोलनी एवं हिटलर द्वारा राष्ट्रीय समाजवाद कही जाने वाली, फासीवादी व नाजीवादी व्यवस्था में भी राज्य के जिस रूप का प्रतिपादन किया गया है। वह भी सर्वाधिकारवादी ही है तथा अपने आधुनिक रूप में इन विचारधाराओं द्वारा प्रतिपादित राज्य की व्यवस्था के लिए ही सर्वाधिकारवादी राजनीतिक व्यवस्था शब्द का प्रयोग किया गया है। इन विचारधाराओं के प्रतिपादन में भी व्यक्ति की तुलना में राज्य को श्रेष्ठ माना गया है जैसा कि मुसोलनी ने कहा है कि “राज्य एक आध्यात्मक इकाई है तथा वह ऐसा संगठन है, जिसका उदभव व विकास परमात्मा की अभिव्यक्ति है।” तथा जैसा कि जैन्टाइल ने भी कहा है, “व्यक्ति की कौन-सी स्वतंत्रताओं को काट दिया जाय और कौन-सी स्वतंत्रताओं को बनाए रखा जाय, इसका निर्णायक व्यक्ति नहीं होता वरन केवल राज्य होता है।”[10]
            लोकतंत्रीय शासन भी जिसे व्यक्ति, उसके व्यक्तित्व एवं उसकी स्वतन्त्रताओं की मान्यता पर आधारित शासन माना जाता है, व्यवहार में सर्वाधिकारवादी हो जाता है। क्योंकि लोकतन्त्र के नाम पर जो व्यवस्था चल रही है, वह राज्य-तंत्र की पद्धति से ही चल रही है, अत: उसका स्वरूप सर्वाधिकारी सर्वग्राही राज्यवाद के रूप में ही दिखाई देने लगता है। लोकतंत्रीय व्यवस्था दल प्रणाली के माध्यम से चलने वाली व्यवस्था है। यद्यपि उसमें विविध दलों के बीच सत्ता परिवर्तन की व्यवस्था रहती है फिर भी उन परिस्थिति में जब लोकतन्त्र का रूप दलीय अधिनायक तंत्र का हो जाता है और जब कोई दल किसी न किसी प्रकार सत्ता को हथियाते रहने की स्थिति प्राप्त कर लेता है, उस स्थिति में लोकतंत्रीय व्यवस्था भी सर्वाधिकारवादी हो जाता है। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण समाज की सत्ता पहले एक राजनीतिक दल विशेष में और फिर उस दल विशेष के माध्यम से किसी व्यक्ति समूह में अथवा किसी व्यक्ति विशेष में निहित हो जाता है। एसी स्थिति में व्यक्ति के उन अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं पर भी जिन्हें मूलभूत कहा जाता है राज्य का पूर्णाधिकार स्थापित हो जाता है।
            सर्वाधिकारवाद राज्य के ऐसे रूप में विश्वास करता है, जो पूर्ण प्रभुत्वशाली हो और जिसकी सत्ता निरंकुश हो। सर्वाधिकारवाद राज्य के विषय में हीगल द्वारा प्रतिपादित इस धारणा को मानता है, जिसके अनुसार उसे पृथ्वी पर ईश्वर का साक्षात आगमन (March of Good on Earth) माना जाता है। सर्वाधिकारवाद के अनुसार राष्ट्र का श्रेष्ठतम रूप वही है, जिसमें राजसत्ता किसी एक शक्तिशाली दल या दल में भी शक्तिशाली एक व्यक्ति के हाथों में निहित हो तथा वह व्यक्ति अपने विवेक के अनुसार राष्ट्र के हित का निर्धारण करते हुए शासन का संचालन करे। किसी व्यक्ति, व्यक्ति के किसी समूह, किसी दल या किसी अन्य शक्ति द्वारा उसके निर्णयों एवं कार्यों की आलोचना या विरोध सर्वाधिकारवाद के अनुसार मान्य नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी मान्यता है कि राज्य कभी कोई त्रुटि नहीं कर सकता है। सर्वाधिकारवाद की यह मान्यता है कि व्यक्ति उसके व्यक्तित्व, उसके अधिकार एवं विचार आदि सब पर राज्य का पूर्ण अधिकार है। संक्षेप में, सर्वाधिकारवाद के अनुसार राज्य साध्य तथा व्यक्ति उसका साधन मात्र है।[11]
            सर्वाधिकारवाद व्यक्तिगत जीवन पर ही नहीं, सार्वजनिक जीवन पर भी राज्य के पूर्ण एवं निरंकुश नियंत्रण का समर्थन करती है। सर्वाधिकारवादी शासन-प्रणाली में जनसाधारण को अपना स्वतंत्र मत या अधिमान्यताएँ प्रकट करने या अपनी मांगे प्रस्तुत करने का अवसर या अधिकार भी नहीं देता इस तरह सत्ताधारी लोकमत के प्रति उत्तरदाई नहीं होता है। निर्णय की प्रक्रिया में सार्वजनिक चर्चा या लोकप्रिय मतदान की अनुमति भी नहीं दी जाती है, बल्कि मात्र सत्ताधारी के निर्णय को ही मान्यता दी जाती है। वहां किसी समानान्तर सत्ता को भी सहन नहीं किया जाता है। जैसा कि सैबाइन ने कहा है कि “सरकार की आज्ञा के बिना न तो राजनीतिक दलों, श्रमिकों के समुदाय तथा औद्योगिक या व्यापारिक समुदायों का निर्माण किया जा सकता है और न सरकार के नियमों के बाहर कोई व्यक्ति किसी वस्तु का निर्माण ही कर सकता है। वह न कोई व्यापार ही कर सकता है और न कोई काम। उसके आदेश के बिना न कोई प्रकाशन किया जा सकता है और न कोई सार्वजनिक सभा ही की जा सकती है। शिक्षा पर उनका पूर्ण अधिकार होता है। विश्राम एवं आमोद-प्रमोद के साधन प्रचार के साधनों का रूप धारण कर लेते हैं। इस प्रकार मानव के समस्त जीवन व क्रिया कलाप पर राज्य का अधिकार हो जाता है और व्यक्ति का अपना कहने योग्य कुछ भी नहीं रह जाता है।”[12]
            सर्वाधिकारवाद बुद्धिवाद का विरोध करता है। सर्वाधिकारवादियों के अनुसार मनुष्य अत्यधिक तर्कशील एवं बुद्धिपरक होकर उन्नति नहीं कर सकता है। उनके मत में वह तभी ऊँचा उठ सकता है। जब वह अपनी स्वाभाविक प्रेरणा एवं प्रवृतियों के अनुसार कार्य करे। उनके अनुसार कठिन अवसरों पर कठिन समस्याओं का समाधान बौद्धिक कसरत करते रहने से नहीं, वरन स्वाभाविक प्रेरणा के अनुसार कार्य करने से होता है। अत: उनका मत है कि मनुष्य को बुद्धिपरक होकर नहीं, भावनापरक होकर जीवन व्यतीत करना चाहिए। अपनी इस मान्यता के कारण सर्वाधिकार को बुद्धि विरोधी दर्शन कहा जाता है।[13]
            सर्वाधिकारवाद एक अतिवादी विचारधारा है। चूँकि सभी सर्वाधिकारी राज्य राष्ट्रीयता राज्य ही हुए हैं, अत: उनके लिए यह स्वाभाविक है कि वे राष्ट्रीयता की भावना पर अत्यधिक बल देते है। सर्वाधिकारवाद राष्ट्रीयता के उग्र रूप का समर्थन करके राज्य के लिए लोगों की भक्ति भावना प्रगट करने में विश्वास करता है। सर्वाधिकारवाद का यह लक्षण वस्तुत: फासीवाद तथा नाजीवाद में अधिक सत्य है।[14]
            सर्वाधिकारवादी विचारधारा राजनीति में नैतिक सिद्धांतों एवं मूल्यों की कोई उपयोगिता नहीं समझता और उनके प्रति पूरी तरह से उदासीन रहता हैं। सर्वाधिकारवादियों की मान्यता है कि राष्ट्र को ऊँचा उठाने के लिए उचित- अनुचित सभी उपायों को काम में लाया जाना उचित है। उनके अनुसार अभीष्ट राजनीतिक उद्देश्य की सिद्धि के लिए  विद्वेष, घृणा धोखाधड़ी आदि का सहारा भी लेना पड़े, तो उसमें कोई दोष नहीं है। उनके अनुसार नैतिकता एवं सत्य आदि का आश्रय लेना तो कायर लोगों का काम है। जो अपने राष्ट्र के हित के लिए मरना जानते हैं, उन्हें उसके हितों की साधना के लिए किसी भी प्रकार के उपायों का प्रयोग करने से नहीं हिचकना चाहिए। इटली में मुसोलनी ने एवं जर्मनी में हिटलर ने इसी प्रकार का आचरण किया था इस आधार पर सर्वाधिकारवाद को मैकियावेलियन दर्शन भी कहा जाता है।[15]




[1] जोशी, रामशरण; आदिवासी समाज और शिक्षा, अनु॰, अरुण प्रकाश, ग्रंथ शिल्पी, नई दिल्ली, पुनर्मुद्रण, 2004, पृ. 127-28
[2] कोली, सी. एम.; आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त एवं विश्लेषण, साहित्यागार,जयपुर, 2001, पृ. 207 
[3] वही;  पृ. 208
[4] नारायण, इकबाल; आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, ग्रंथ विकास जयपुर, 2005, पृ. 306
[5] वही; पृ. 313-14
[6] वही; पृ. 307
[7] वही;
[8] वही; पृ. 308
[9] वही; पृ. 308-9
[10] वही; पृ. 309
[11] वही; पृ. 310-11
[12] वही; पृ. 311
[13] वही; पृ. 311-12
[14] वही; पृ. 312
[15] वही;